मन की खिड़कीकल्पना पाण्डेय का साहित्यिक संसार
शब्दों के
बीच
मन, स्मृति, प्रेम और जीवन के बीच लिखी गई रचनाओं का एक जीवंत, स्वतंत्र और कालक्रमिक घर।


“लिखना अपने भीतर की रोशनी को बचाए रखना है।”
एक लेखिका, अनेक मौसम
अपने मन का
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यह संग्रह कल्पना पाण्डेय की अपनी फेसबुक लेखन-यात्रा से बनाया गया है—उनकी आवाज़, उनकी तारीख़ों और उनकी मूल पंक्तियों के साथ।
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- 01
रिश्ते दोनों की जरूरत हो तो रिश्ता बनता है
रिश्ते दोनों की जरूरत हो तो रिश्ता बनता है , जरूरत पूरी होती रहे तो रिश्ता पनपता है जरूरत अधूरी रह जाये तो रिश्ता खिंचता है , क्या ये रिश्ता जरूरतें पूरी करने का जरिया है ? ये कैसा रिश्ता है जो जरूरत से ज्यादा हम पर हावी है? रिश्ता प्यारा है ,तो सहारा है . रिश्ता बेमेल है ,तो दूर किनारा है. रिश्ता गर हम है ,तो राह आसान है रिश्ता गर मै है, तो चट्टान है रिश्ता ऊलझ जाये ,तो जन्जाल है रिश्ता टूट जाये, तो यादों का कन्काल है रिश्ता लेना -देना है, तो हिसाब है रिश्ता पुराना है, तो यादों की किताब है रिश्ता अह्सास है, तो जीवन्त है रिश्ता विश्वास है ,तो अनन्त है रिश्ता निभ जाये, तो मर्यादित है रिश्ता सिकुड जाये, तो सीमित है रिश्ता थोपा जाये, तो बोझ है रिश्ता जताया जाये, तो सन्कोच है रिश्ता बोया जाये, तो जन्नत है रिश्ता सीन्चा जाये, तो उन्नत है रिश्ता काटा जाये ,तो कुन्ठित है रिश्ता कट जाये, तो हारा पथिक है रिश्ता थम जये, तो बन्द सांस है रिश्ता बह्ता जाये, तो जीने की आस है रिश्ता मांगता है ,तो लालच है रिश्ता अनकहा है, तो कोरा कागज है रिश्ता बनवटी है ,तो शून्य है रिश्ता सजावटी है ,तो न्यून है रिश्ता इकतर्फा है तो ,आफत है रिश्ता मनचाहा है ,तो चाहत है रिश्ता सिसकता है, तो आगे तूफान है रिश्ता भटकता है, तो दिल में उफान है. रिश्ता संम्भल जाये, तो बनता गुमान है रिश्ता अनचाहा है, तो बन्द जुबान है रिश्ता नहीं ,तो तू अकेला है इसमें बुना जिन्दगी का झमेला है जिन्दगी में कई रिश्ते निभा रहे हैं कभी टूटती ,कभी ऊल्झती,कभी जुडती,कभी यूंही रिश्तों की डोर में बन्धे चले जा रहे हैं.
- 02
उस तक मेरा कुछ पहुँचता नहीं
उस तक मेरा कुछ पहुँचता नहीं …................. दिल की धडकनों में उसका पता ढूंढना चाहती हूँ, पर वो इसमें बसता नहीं शब्दों से नहीं , इशारों से समझना चाहती हूँ, पर वो कुछ कहता ही नहीं ं हँसते -हँसते उसके साथ रोना चाहती हूँ,पर वो मुस्कुराता तक नहीं कभी साथ, कभी पीछे उसके चलना चाहती हूँ,पर वो साथ चलता नहीं बहते आंसूओं को थामना चाहती हूँ ,पर वो भीगता ही नहीं होठों की मुस्कान उस पर धरना चाहती हूँ,पर वो मशरूफ है कहीं आवाज़ देकर पास बुलाना चाहती हूँ ,पर उसकी आवाज़ लौटती नहीं स्नेह भरे स्पर्श से दूरियाँ मिटाना चाहती हूँ ,पर वो बहुत दूर है कहीं दिल के आईने में उसकी तस्वीर देखना चाहती हूँ,पर वो वहां है ही नहीं इंतज़ार में आँखें बिछाना चाहती हूँ,पर वो इस राह का मुसाफिर नहीं अपने वादों में शामिल करना चाहती हूँ,पर उसे कोई वादा याद नहीं उसकी तस्वीर से बात करना चाहती हूँ ,पर वो भी चुप्पी साधे है अभी कंधे में सर रख ,दो पल यूं ही बैठना चाहती हूँ,पर वो एक पल भी मेरा नहीं एक नहीं , अपने सभी राज़ खोलना चाहती हूँ ,पर वो इसके लिए राज़ी नहीं रूमानी बारिश में भीगना चाहती हूँ ,पर मुझ पर बरसना उसकी फितरत नहीं अपनी खुशबू से उसे बहकाना चाहती हूँ,पर वो कभी भटकता नहीं आसमान छूना चाहती हूँ ,पर उसके पंखों में मेरे लिए परवाज़ नहीं छोटी -छोटी खुशियाँ समेटना चाहती हूँ पर वो मेरी ख़ुशी में शामिल नहीं दोस्त नहीं ,हमसफ़र मानना चाहती हूँ,पर उसको मेरी कोई खलिश नहीं , ज़िन्दगी की हर जंग मिल कर लड़ना चाहती हूँ,पर वो इसके लिए तैयार नही वक्त ही नहीं ,उम्र गुज़ारना चाहती हूँ,पर उसका साया तक यहाँ से गुज़रता नहीं हरदम कुछ देना और कभी कभी कुछ पाना चाहती हूँ, पर अब हमारा ऐसा रिश्ता नहीं चाहते चाहते ज़िन्दगी में आगे निकल आये हैं सारी चाहतें पीछे दूर कहीं छोड़ आये हैं बरसों बाद आज भी वो नहीं है मेरे करीब लेकिन आज वो किसी का, और मैं किसी और का हैं बुलंद नसीब
- 03
यहाँ कुछ टिकता क्यों नहीं
यहाँ कुछ टिकता क्यों नहीं? टिकती नहीं सफलता, पाते ही बढ़ जाती है और पाने की मानसिकता टिकता नहीं विश्वास, दोनों में से एक है, दगाबाज़ टिकता नहीं भाईचारा, उफ़ ये सोच ....इतना सा मेरा ,तेरा क्यों है इतना सारा ? टिकती नहीं मुहब्बत , असमंजस में है, रिश्ता अपनाऊ या दौलत ? टिकता नहीं वादा, स्वार्थी फितरत है, जरूरत से ज्यादा टिकती नहीं नज़र , आज है झुकी ,कल देखेगी ऊँचाइयों का पहला प्रहर टिकती नहीं घडी की सुइयाँ , एक लाती है गम, दूसरी देती है खुशियाँ टिकती नहीं दोस्ती , सहना तो दूर ,देख भी नहीं सकती यार की उन्नति टिकती नहीं मुस्कान , होठों पर धरता कम ,छीन ता ज्यादा है इंसान टिकता नहीं रिश्ता , समय के साथ पकता जाता ,उम्र के साथ झड जाता टिकती नहीं जवानी चढ़ती सूरज की तरह, सूखती जैसे मरू में पानी टिकते नहीं आंसू, बहते ख़ुशी में और तब भी जब मैं उदास हूँ टिकती नहीं दौलत , आज है बेशुमार ,जाने कब पलट जाये किस्मत टिकती नहीं जीत , विजयी आज तू है ,कल किसी और की होगी जीत टिकती नहीं हार, अभी हूँ पस्त लाचार ,कल करूंगा संभल कर वार टिकती नहीं यादें , परत दर परत बिछती जाती ,कब तक इसको लादें? टिकती नहीं आदत , नयी लगते ही, पुरानी की हो जाती सहादत टिकता नहीं ईमान , है बहुत सस्ता ,खरीदता -बेचता इंसान टिकती नहीं जुबान , फिसल -फिसल कर अब बची कहाँ इसकी पहचान? टिकती नहीं प्रार्थना, आज इसके लिए ,कल उसके लिए ,भगवान् बदल बदल होती याचना टिकते नहीं जज़्बात , प्रेमवश नहीं, आवश्यकता वश निभाते एक दूसरे का साथ टिकती नहीं शर्म , पहले आँखों में थी,अब बची भी है? होता इसका भ्रम टिकती नहीं इच्छा , दिमाग कहे यही अच्छा ,मन मांगे उससे कई गुना और अच्छा टिकता नहीं वजूद , जीवन भर कायम ,मृतक का नहीं कही मौजूद और भी कई चीजें हैं जो टिकती नहीं , मेरी सोच और कलम भी टिकती नहीं , क्या आपको भी ऐसा सब लगता नहीं , आस पास ऐसा सब दिखता नहीं? इसी लिए तो कहती हूँ यहाँ कुछ टिकता नहीं टिकता है, तो रुकता नहीं !
- 04
पहाड़ी आसमान में उड़ते दो बादलों में
पहाड़ी आसमान में उड़ते दो बादलों में एक पहाड़ी ,एक विदेशी सा लगता है दोनो को जुड़ा हुआ देख , पुराना याराना सा लगता है मुस्कुराता हुआ बादलों का जोड़ा , पहाड़ी सुन्दरता को निहारता सा लगता है उनकी आँखों से ये नज़ारा, कुछ इस तरह सा लगता है पहाड़ की फिजा में पुराना कोई गीत गूंजता सा लगता है सब कुछ यहाँ धुला धुला,स्वच्छ , उजला-उजला सा लगता है शहर की उलझनों से दूर ,थमा सा ,सांस लेता हुआ सा लगता है दो पल रुक ,दूसरों की नयी -ताज़ी सुनता सुनाता सा लगता है यहीं रहकर ,जरूरतों को छांट कर ,सीमित करता हुआ सा लगता है बदलते वक़्त के साथ ,किसी भी दम पर खुद न बदलता हुआ सा लगता है पहाड़ से जुड़ा पहाड़ी कहलाने का गौरव प्राप्त करता सा लगता है बाह्य आडंबर को त्याग ,अपना सात्विक रूप धरा सा लगता है खुद जियो ,दूसरों को जीने दो का अर्थ सार्थक करता सा लगता है मौसम भी यहाँ पल-पल आँख मिचौली खेलता सा लगता है हर खिलता फूल आने वाले का स्वागत करता सा लगता है फलों से लदा पेड तेरे सम्मान में सर झुकाया सा लगता है कहीं कोयल, कहीं कोई पंछी का स्वर, हमारा हाल पूछता सा लगता है रात को चमकता जुगनू ,अँधेरे में राह दिखता सा लगता है भोर होते ही सूरज, मेरे द्वार पर पहली दस्तक देता सा लगता है मंद मंद बहता हवा का झोंका, मेरे लिए, सिर्फ मेरे लिए बहता सा लगता है पहाड़ के उस ओर बना घर रंगीन माचिस की डिबिया सा लगता है दूर पहाड़ पर खड़ा देवदार का वृक्ष अपना परचम लहराता सा लगता है ऊंची नीची सड़कों में जन और जीवन बंधा सा लगता है सामने दिखता सीढ़ीदार खेत तेज़ बारिश में भी डटा -डटा सा लगता है दूर कहीं बजता भजन बिलकुल करीब कान में सुनाई सा लगता है कंधे पर बस्ता ,आँखों में चमक लिए बच्चा स्कूल जाता सा लगता है राह में बैठा राही घंटों से गाड़ी का इंतज़ार करता सा लगता है ऊँचाइयों पर बसा मेरा घर और उन्नत होने का आशीर्वाद सा देता लगता है ऊंचा नीचा रास्ता हर दिन स्थिरता का इम्तेहान लेता सा लगता है बड़ी सी नथ ,पिछोड़ा ओढे युवती का रूप यहाँ की संस्कृति का प्रचार करता सा लगता है माथे पर पिठिया ,सर पर टोपी ,दाज्यू कहता हुआ युवक ठेट पहाड़ी सा लगता है पहाड़ी आसमान से ऐसा नज़ारा देख कर बादलों को वक़्त का पता सा नहीं लगता है चाह कर भी वक़्त रुकता नहीं ,छुट्टियाँ ख़त्म होने में समय कहाँ लगता है? अनमना सा विदेशी बादल चुपचाप सामान बाँधता सा लगता है नौकरी और रोटी की उलझन में शहर की तरफ खिंचता सा लगता है जाऊं, न जाऊं? सोचकर विचलित सा ,त्रिशंकु की तरह लटका सा लगता है पहाड़ी बादल हाथ पकड़कर दाल रोटी खा यहीं रुकने की प्रार्थना सा करता लगता है पर विदेशी बादल जरूरत से लम्बी अपनी जरूरतों की गिनती गिनाता सा लगता है भारी मन से आंसुओं की सौगात के साथ विदा लेता सा लगता है जल्द से जल्द पहाड़ लौट आने का वादा देता सा लगता है हाय !बेचारा कर्मभूमि के लिए ,जन्मभूमि को छोडता सा लगता है विदेशी बादल आज पहाड़ से मैदान में उतरता सा लगता है पीछे मुड़ -मुड़ कर पहाड़ी हर चीज़ को आँखों में समेटता सा लगता है हरा -भरा उन्नत होते हुए भी अपनी जड़ों से कटा-कटा सा व्यथित लगता है जल्द ही यहीं लौट कर बसने का प्रण अपने आप से करता सा लगता है नीचे आता विदेशी बादल अपने भाग्य का कोसता सा लगता है पहाड़ी बादल को दूर तक हाथ उठा-उठा शत-शत नमन सा करता है इतने सालों बाद , आज भी आसमान में लटका पहाड़ी बादल ,मिटटी से जुड़ा ,बेहद संतुष्ट सा लगता है पहाड़ी आसमान में नहीं,पूरी कायनात में उसका वजूद कायम सा लगता है नित नए विदेशी बादलों की सोच बदलने के लिए ,वह सदा ही प्रयत्न्मान सा लगता है आज भी वह बूढ़ा पहाड़ी बादल , अपने पुराने यार का इंतज़ार करता सा लगता है आँखें बिछाये सा खड़ा लगता है
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मायके की थाली
मायके की थाली सहमी सी ,सकुचाई सी ,लाल जोड़े में लिपटी मैं माथे पर बिन्दी ,मांग में भरे सिन्दूर ,अपने नए रूप को निहारती मैं नयी उमीदों और आशाओं के लिए बाहें खोलती मैं बचपन की यादों को डिब्बे में बंद कर पीछे छोडती मैं माँ का आंगन छोड़ , नए सफ़र के लिए तैयार खड़ी मैं बस विदा होने ही वाली थी ................. तभी आँखों में आंसू ,मन मेंआशीर्वाद लिए माँ ने मेरे हाथ में कुछ थमाया कहा ... इसमें मेरा सारा प्यार है समाया मेरे पास जो कुछ था मैंने इस थाल में है सजाया सादी सी दिखती थाली में माँ ने करीने से था बहुत कुछ था लगाया थाली में लिखा था मेरा नाम , नाम ही नहीं ,रिश्ता भी देख रही थी जुड़ता थाली में रखा था प्यार, ऐसा हो इसका भण्डार , ,कभी कम न हो, सदा रहे बढ़ता थाली में रखा था आदर , रिश्ते के लिए नहीं, अनुभवों के लिए रहे सर झुकता थाली में रखी थी सुन्दरता , तन का नहीं,मन का रूप रहना चाहिए निखरता थाली में रखी थी पूजा , ईश्वर और कर्म दोनों की ,इसके बिना इंसान कुछ नहीं है बनता थाली में रखी थी स्वछता , साफ़ घर में ही नहीं ,साफ़ मन में भी भगवान् है बसता थाली में रखा था स्वाद , अन्नपूर्णा बन कर, रसोई घर रहे महकता थाली में रखा था सत्कार , आनेवाला कोई भी हो ,निकले तेरे घर से प्रसन्नचित ,हँसता -हँसता थाली में रखा था ज्ञान , छुपाना नहीं,बाँट देना,इससे नहीं कोई दान है सस्ता थाली में रखा था विश्वास , हो जाये तो बना रहता,खो जाये तो मुश्किल से मिलता थाली में रखी थी मितव्ययता , संभल -संभल कर खर्च करना,तभी रहेगा भविष्य के लिए बचता थाली में रखी थी सूझ बुझ , विवेक थामे रखना,हालात की बयार बहे चाहे उलटी दिशा में कितना थाली में रखी थी सच्चाई , रहे मन और वचन दोनों में,झूठ का भेद एक न एक दिन है खुलता थाली में रखी थी संतुष्टि , दूसरे पर न रहे दृष्टि ,दूसरे का बड़ा लड्डू किसी हाल में नहीं पचता थाली में रखा था सुकून , शांत रह,समय से पहले ,किस्मत से ज्यादा कभी किसी को नहीं मिलता थाली में रखी थी ममता , नारी को पूर्ण करती,भरे परिवार से सजा रहे तेरा गुलदस्ता थाली में रखी थी दूर दृष्टी , दूर से आफत को, पास के दुश्मन को .परे रखना ,चाहे प्रयत्न जितना रहे करता थाली में रखी थी आज़ादी , हर तरह की अपने लिए पूरी रखना,बंधा पंछी ,बंधा विचार जीता कहाँ? मर जाता थाली में रखा था स्वाभिमान , गाढ़े रखना अपनी पहचान,जूझना और डटे रहना ,कभी न करना समझौता थाली में रखी थी अनोखी सोच संस्कारों में लिपटी रहना,परिवर्तन का स्वागत करना ,ये माँ ने सोचा ,और भला ये कौन सोचता ? इतनी भरी थाली में सब से ऊपर सजी थी मेरी माँ की मुझसे आशाएं खुश रहूँ ,आबाद रहूँ ,आज तक देती है दुआएं इतने सालों में मायके की थाली मेरे बहुत काम आई है बिलकुल वैसी की वैसी है ,इसमें एक खरोंच तक नहीं आई है जीवन के हर मोड़ पर मैंने इसमें रखी चीजें आजमाई है मायके की थाली अब मेरे चरित्र में समाई है अपनी बेटी को भी यही दूँगी, आखिर वो मेरी परछाई है बचपन से आज तक मैंने यही दौलत तो कमाई है अरे हाँ ,थाली के साथ माँ ने एक पुड़िया भी थमाई थी जिज्ञाषा वश मैंने उसे खोलकर देखा था उसमे अहंकार ,आलस ,इर्ष्या ,धोका,झूठ ,अनादर,क्रोध,कमियाँ ,शक ,नफरत जैसा कुछ लिखा था विदा करते वक़्त कान में मेरे वह फुसफुसाई थी ........ ससुराल में पहला कदम रखने से पहले ,इस पुड़िया को तुम दोनों के ऊपर से न्योछावर कर देना और इस पुड़िया को वहीँ किसी पहाड़ से नीचे फेंक देना
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पुराना होने का दुःख
पुराना होने का दुःख आज मन कुछ ढूंढ़ रहा है,जाने क्या गुम खोज रहा है ? ऐसा कुछ जो अनजाना सा,ना जाना पर पहचाना सा सुनी नजरे,खाली मन ,यहाँ वहां ,कभी इधर उधर देख पुराने कमरे को ,जम गयी उस पर मेरी नज़र घुप्प अँधेरा तन्हाई भरा ,सूना -सूना ,मरा -मरा हलके हलके, जरा -जरा , कोई बोला डरा -डरा आई हो तो चिटखन खोलो,कोई न लेता तुम सुध ले लो हममे भी थी कभी कुछ बात ,अगर न पड़ती वक़्त की लात हाथ बढाकर चिटखन खोली, रखी चीज़ें कुछ न बोली धूल भरी जब आँखें खोली, मुस्काई वे हौली -हौली अलमारी में थी बंद घडी ,हाथ लगाते बोल पड़ी अच्छा-बुरा समय है बीता, कुछ-कुछ हारा ,बहुत कुछ जीता हार जीत मुट्ठी में बांधे पकड़े -पकडे थक गयी हूँ ,थक गयी ,तो रुक गयी हूँ अलमारी में उलटी पड़ी एक लालटेन , उजाले को हाथ देती ,अँधेरे को गले लगाती थी लालटेन, कराह कर टूटे कांच में से बोली जिंदगी गुजार दी अंधेरों को पोछते हुए ,आज खुद हूँ अँधेरे से लिपटे हुए अलमारी में दिखा एक चटका आइना , अपनी दरार से उभर कर ,बोला वह आइना , रंग और रूप ही नहीं ,आत्मा को मुझ में देखा है अब कुरूप हो गया मन,बिक गयी आत्मा,तभी तो टुटा हुआ मुझे यहाँ फैंका है अलमारी मे थे कुछ ताश के पत्ते , अपने साथियों से बिछुड़े ,आधे अधूरे पत्ते , कभी जीते ,कभी हारे ,जब जब बिछे ये पत्ते जुऐ में जीत कर साथी खो दिए, जिंदगी में हार कर रिश्ते खो दिए अलमारी में दिखा मुड़ा-तुड़ा कागज़ का टुकड़ा चिट्ठी थी शायद,लिखा था दिल का दुखड़ा पीले पड़े कागज़ पर,स्याही भी धुल गयी थी धुंधले शब्दों में जिसके नाम की चिट्ठी थी ,वो कब की चिर निंद्रा में सो गयी थी अलमारी में पड़े थे कुछ सिक्के कभी हाथ बदलते थे ,अब खारिज हो चुके ये सिक्के खन -खन बोले मायूस हताश नए का स्वागत ,पुराने की गत्त ऐसी ,इंसानी फितरत ही ऐसी अलमारी के कोने में ख़ड़ी थी एक कलम , घिसी हुई,टूटी बुदबुदाई कलम, पुरानी हूँ ,पर आज भी मुझ में बहुत है दम , लिखूं क्या ? भावना -जज़्बात हैं नहीं ,अलफ़ाज़ भी हो गए है कम अलमारी के दाएँ तरफ़ पड़ा था चश्मा , मोटे से फ्रेम वाला ,खरोंचों से भरा चश्मा , बोला शीशा मलते मलते अच्छे -बुरे लोग दिखें हैं चलते- चलते , नज़र का धोखा है, अच्छाई भी चलती है ,बुराई के साथ गले मिलते -मिलते अलमारी में धरा था एक हुक्का अधजला ,थोड़ी राख लगा ,हुडकर बोल हुक्का , वक़्त के धुंए में सब कुछ उड़ा चुका हूँ जिंदगी भर हुड -हुड करने वाला मैं, चुपचाप बुझी आग के साथ सो गया हूँ अलमारी में तमाम चीजें थी धूल में पड़ी सब पर पुराने और बेकार होने की लानत पड़ी आंसू से मैं पोंछ रही थी ये क्या ढूंढा ? सोच रही थी नया -पुराना, आना -जाना , जिन्दगी गाती अजब तराना नया है तो नवीन, नवीन है तो पुरस्कृत , पुराना है तो प्राचीन ,प्राचीन है तो तिरस्कृत , समय का पहियाँ नापता यहाँ हर तोल नया है तो अनमोल,पुराना है तो बेकार-बेमोल
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काश
काश ...................... काश......... तू सीप ,मैं मोती होती , तेरे आगोश में पनपती ,खूब चमकती मेरी नजर में तू , और तेरी नज़र सिर्फ मुझ पर पड़ती सारे जहाँ से छिपी - छिपी, मेरी चमक सिर्फ तेरी होती काश …........ तू पर्वत ,मैं तुझसे निकलती धारा होती जिंदगी की ऊँची -नीची डगर में तेरा साथ देती तू रोकता .............रुक जाती ,बह जा कहता ........ बह जाती बादल बन तुझ पर बरसने फिर लौट आती बता? तुझ से जुदा कैसे रह पाती? काश .........तू इन्द्रधनुष ,मैं तुझमें भरा रंग होती तू खूबसूरत ,मैं तेरी खूबसूरती की वजह होती तेरी सुन्दरता में ,मैं खुद को रंगीन पाती जब तू मिटता ,मैं भी अपने रंगों को आसमां से पोंछ देती काश ........ तू सागर ,मैं तुझसे उठती लहर होती तू पानी से ,पर मैं तो सिर्फ तुझसे बनती ताउम्र तुझसे उठती और हर बार तुझमें डूब जाती तू मुस्कुराता तो लहर रहती ,नाराज़ हो जाता तो तूफ़ान ला देती काश ....... तू हिरन , मैं कस्तूरी होती तुझ में कैद रहती ,हमेशा समाये रहती अपनी खुशबु से तुझे सरोबार रखती वजह मैं होती ,पर दुनिया तेरी दीवानी होती काश…...तू पेड़ ,मैं तुझसे लिपटी बेल होती तेरा सहारा लिए बढती जाती तेरे साथ तेरी ऊँचाइयों की साक्षी कहलाती काट देता,अलग करता कोई अगर,जीती कहाँ ?विरह में सुख जाती काश ….......तू किताब ,मैं उसमे लिखे शब्द होती शुरू से आखरी'पन्ने में ,मैं ,सिर्फ मैं होती तुझे कायम करने में, मैं खुद को बिछा देती मान न मान ,मैं न होती तो तेरी रचना कहाँ से होती काश .......तू सिर्फ तू ,मैं तेरी परछाई होती दिन भर तेरे आगे -पीछे डोलती रात को तेरे संग सो जाती फिर अगली सुबह सब कुछ छोड तेरे संग हो जाती मैं तो तेरे लिए ,कभी ये कभी वोह होती काश तुझे भी मेरे होने न होने की फिक्र होती कभी सोचती हूँ वोह ही क्यों आगे और मैं उसके पीछे होती आज भी हम साथ होते अगर उसे मेरे कुछ भी होने की क़द्र होती
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यहाँ वहां के बीच …...................... ऐसा क्यों है
यहाँ वहां के बीच …...................... ऐसा क्यों है? वहां इतना सुकून , यहाँ इतनी हलचल क्यों है? वहां मन ठहरा हुआ निश्चिन्त , यहाँ बेचैन ,मचलता क्यों है? वहां दिन निकलता ,बढ़ता,ढलता सा, यहाँ चुटकी में कटता क्यों है? वहां खुली छत के ऊपर चाँद -तारे बसते , यहाँ मेरी छत के ऊपर किसी और परिवार का बसेरा क्यों है ? वहां बच्चों का बचपन खुला आँगन , यहाँ खिल्लोनों से भरा बंद कमरा क्यों है ? वहां यौवन घूँघट में भी खिला-खिला खूबसूरत , यहाँ नक़ाब ओढ़े हुए डरा -सहमा क्यों है ? वहां का बादल पारदर्शी ,छूकर गुजरता हुआ , यहाँ धूएँ से बना विषेला क्यों है? वहां पेड़ -पोंधे मुस्कुराते हरे भरे , यहाँ धूल से ढके,कृत्रिम बस खड़े भर क्यों हैं ? वहां हवा पानी दोनों ताज़े ,बहते हुए , यहाँ दोंनों रुके से बदबूदार क्यों है? वहां जीव- जंतु खुद आहार ढूंढ़ते , यहाँ पराश्रित मनुष्य की जूठन पर निर्भर क्यों है? वहां दूर तक खेत -खलिहान हरियाली, यहाँ बागवानी केवल गमले तक सीमित क्यों है? वहां मन ही नहीं हर वस्तु निर्मल, यहाँ सब नकली -मिलावटी क्यों है? वहां छोटी सी बाज़ार,हर तबके के लिए एक, यहाँ हर दुकान जेब के वज़न अनुसार अपना ग्राहक चुनती क्यों है? वहां ज़रुरत के हिसाब से आवश्यकता यहाँ आवश्यकता से ज्यादा जरुरतें क्यों हैं? वहां आधी रोटी में भी संतुष्टी , यहाँ छलकती थाली भी छोटी लगती क्यों है? वहां थोडा-थोडा कम-कम भी अधिक, यहाँ अत्यधिक-अपार भी थोडा सा कम लगता क्यों है? वहां लगभग एक सी सादी पोशाक, तन ढांके हुए ,यहाँ चमकीले भड़कीले वस्त्रों में भी मनुष्य नग्न क्यों है? वहां पाठ पूजा नित्य कर्म , यहाँ त्यौहार पर भगवन को दर्शन देने की उलटी प्रथा क्यों है? वहां बुढ़ापा आदरणीय ,घर की शोभा , यहाँ बूढ़े माँ-बाप उपेक्षित ,घर के पहरेदार क्यों है? वहां घर छोटे पर रिश्ते निभते हुए, यहाँ बड़ा घर पर रिश्ते छूटते -बिखरते क्यों है? वहां दूसरों से कोई द्वन्द नहीं, सब अपने से , यहाँ कोई अपना नहीं,सारे प्रतिद्वन्दी क्यों है ? वहां लोग अपनी जड़ों को पकडे हुए, यहाँ दूसरों की जड़ें काटने को आतुर क्यों हैं? वहां हर बंदा जाना -पहचाना सा, यहाँ हर कोई अनजान ,अजनबी,या शातिर सा लगता क्यों है? वहां हर कोई खुली किताब सा सरल, यहाँ हर व्यक्तित्व उलझा हुआ जटिल परीक्षा का प्रश्न क्यों है? वहां थोडा-थोडा बचाकर कल के लिए , यहाँ ज्यादा से ज्यादा बचाकर कैसे-कहाँ छिपाऊं , ये तृष्णा क्यों है? वहां समय और उम्र अपनी गति से गुजरते , यहाँ समय फिसलकर, उम्र से पहले बुढ़ापा लाता क्यों है? वहां इंसान फूंक -फूँक कर , कदम रखता हुआ , यहाँ तेज़ रफ़्तार को गले लगाकर ,मरता-मरता भी जिद्द पूरी करता क्यों है? वहां अपनी पारी पूरी कर आंखरी सांस लेता, यहाँ चिंता ,बीमारी या काम के बोझ से घायल अचानक पारी अधूरी छोडता क्यों है? वहां वह एक ही बार मरता, यहाँ हर रोज़ सौदा-समझौता करता हुआ ,पल-पल की मौत मरता क्यों है ? वहां जीवन शांत ,स्वेच्छा से भरा हुआ, यहाँ हर पल प्रयत्नशील,मांगता सा,काटता सा लगता क्यों है? यहाँ और वहां के बीच हम सब झूलते रहते हैं हर बार वहां को लांघ कर यहाँ पहुँच जाते हैं गुण वहां के गाते, मगर माला यहाँ की जपते हैं सपना वहां का बुनते हैं ,साकार करने यहाँ आते हैं हम भी पता नहीं ऐसे क्यूँ हैं?
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प्रकृति की अनोखी सीख ,मिली सोलह जून की तारीख
प्रकृति की अनोखी सीख ,मिली सोलह जून की तारीख उत्तर में बसा खूबसूरत अंचल, उत्तरांचल बना सबके मन ने विकास और प्रकृति को जोड़ने का सपना बुना देवों की भूमि का प्राकृतिक सौन्दर्य, नई पहचान पा बढ़ा कई गुना नई सोच और पहाड़ी युवा ने भी इसे अपनी नई कर्मभूमि चुना खुला विकास का द्वार,सड़क और रोजगार से जुड़ गए गाँव जो थे दूर-दराज हर पहाड़ी प्रसन्नचित, आतुर था पहने के लिए विजयी ताज अभी बस पंखों ने भरी ही थी परवाज़, की उत्तरांचल को उत्तरांखण्ड बनाने का हो गया आगाज नाम ही नहीं ,पहाड़ का स्वरूप बदला, बदल गए रीति-रिवाज कभी विकास, कभी संस्कृति , कभी राजनीति के नाम पर नोचने का ,नया नहीं बहुत पुराना था अंदाज़ देव भूमि में उन्नति के नाम पर हर नियम किया गया नज़रअंदाज़ ताक पर रखी हरियाली चुन्नर,लूटी हर किसी ने पहाड़ी फिजा की लाज़ रुका न कोई, अमीर हो या गरीब,नेता हो या जनता,बन बैठा हर कोई यमराज पहाड़ भी सहते जा रहे थे, पड़ रही थी उन पर अलग विकसित प्रदेश बनने की गाज़ कभी इन्हें भी था अपनी नायाब स्वछता ,सुंदरता , स्थिरता पर नाज़ मन मे छुपाए जा रहे थे, स्वार्थी मनुष्य के उससे भी स्वार्थी राज़ इमारत पर इमारत,घर के ऊपर और बड़ा घर ,राज्य निर्माण कहाँ?स्वनिर्माण मे लगे उत्तराखंडी नहीं आ रहे थे बाज़ नित नए पहाड़ों को चीर फाड़ ,नदी को बांध कर सड़क -पुल बनाने का अपना लिया नया काज पहाड़ी कुदरत भी कब तक सहती, ऐसे मदमस्तों का बेतुका मिजाज? चुप्पी साधे , इकटक घूरती रहती ,कभी मनुष्य , कभी भगवान को जो ऊंचाइयों पे बैठे थे विराज कभी होले ,कभी ज़ोर से करती रहती थी इशारे , सुनता कौन? इसकी आवाज कब तक अकेले पानी मे तिनके की तरह तैरती? जब डुबाने को आतुर हो आंकांक्षाओं से भरा पहाड़ी जहाज़ आज तो हद्द हो गयी ,शोषण की इंतेहा हो गयी सदा चुप रहने वाली कुदरत फूट-फूट खूब रोई देवभूमि के देवों से न्याय की गुहार लगाई अपने पर,अपनों से हुए अत्याचार की व्यथा सुनाई मनुष्य का दिया एक –एक जख्म ,एक –एक घाव ,खरोंच तक दिखाई हमेशा मूक रही प्रकृति ने, भगवान से अपनी आवाज़ बनने की अर्जी लगाई भगवान ने भी अपने दरबार मेँ ,कुदरत और मानव की अदालत लगाई प्रकृति को हर मोड पर कर्तव्यपरायण, उदार पाकर, मानव को स्वार्थी तथा भोगी होने की फटकार लगाई जैसे को तैसा........भगवान ने प्रकृति को मनमर्जी करने और मानव को उसे सहने की सज़ा सुनाई 16 जून को पहाड़ी प्रकृति हमारी सज़ा हम पर अमल लाई भगवान के समक्ष ही कुदरत वेग,वर्षा,बाढ़ मिट्टी ,पत्थर से लैस हो आई चंडिका बन हर निवासी ,हर घर की नींव हिलाई बरसों से दबे उदगार को बहते पानी के रूप मे लाई कोई न बचा,भक्त ,निवासी या पर्यटक ,सबको प्रचंड लीला दिखाई धारा रह गया विकास, बह गयी कमाई याद रखेगा मानव यह सीख जो प्रकृति ने झकझोर कर सिखाई भगवान के नाम पर कुदरत इस बार फिर भी शांत हो गयी उत्तरांचल आधा छोड़ , आधा बहा ले गयी हमारी गलतियों को गिना कर हमें दोषी बता गयी आगे भी बहुत कुछ कर सकती है ,इसका मंजर दिखा गयी निर्जीव होकर भी जीवित मनुष्य को अंगूठा दिखा गयी अभी भी सुधार जाओ ! पहले प्यार से, अब बौखलाकर समझा गयी बचे हुए खंडों को जोड़, उत्तराखंड फिर बन जाएगा पाप का घड़ा फूट गया पर, प्रयासों से नया आ जाएगा दिलो-दिमाग के जख्मों को ,मानवता का मलहम लग जाएगा मंदिर ही नहीं ,हर उजड़ा कोना फिर बस जाएगा पर क्या इसमे बसने वाला हर शक्स अपनी गलतियों से कुछ सीख पाएगा? अपने उत्तरांचल के लिए कुछ कर पाएगा?
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मेरा दीवाना
मेरा दीवाना ये मेरा कैसा दीवाना है? जो मुझे पागलों सा चाहता है , मेरे रोम-रोम को पहचानता है, हर सांस में बस मेरा नाम लेता है, मेरे स्पर्श को महसूस करना हक़ समझता है, रात -दिन मेरे ख्यालों में कभी गुम, कभी डूबा ,कभी खो भी जाता है, अपनी पहचान को भूल ,मुझे अपना साया बताता है, हसीन नज़ारों पर नहीं, अपनी नज़र सिर्फ मुझ पर रखता है, मेरे साथ बीते किसी भी पल को ज़ाया नहीं करता है, मेरी या मुझ तक आती कोई भी आवाज सबसे पहले सुनता है क्या सोचती हूँ ,क्या चाहती हूँ ?बांवरा पलक झपकते ही समझ जाता है मेरी ऊमीदों में नितनए रंग भरकर हमेशा कुछ हासिल करने का होंसला भरता है मेरे प्रयासो को हाथ पकड़ कर ऊंचे और ऊंचे आयामों को छूआता है ख्वाइशों की फेरहिस्त चाहे कितनी लंबी हो,माथे पे शिकन नहीं लाता है मेरी हर चाहत को अढ्भुत मान कर जमीन आसमान एक कर देता है मेरे रंग में रंगा हुआ नायाब दुनिया की चमक को खारिज कर देता है नाम मेरा ,पहचान मेरी ,इन दोनों को बनाने में अपना सर्वस्व लुटाता है जमाने भर के दुख और निराशा के बढ़ते कदम वहीं छाँट कर छोटे कर देता है कुदरत की हर खूबसूरत चीज़ मेरी हो जाए ऐसी कामना करता है, मुझे मुसकुराता देखने के लिए खुशियों में लिपटा तोहफा मुझे रोज़ देता है मुकाबला कैसा भी हो ,हर हाल में मेरी जीत निश्चित चाहता है मेरे हर रूप को अपनाता हुआ ,मेरे स्वाभिमान को मान देता है मेरी हर पसंद को चूमता,हर नापसंद को नकार कर आगे बढ़ जाता है मेरे सपनों को अपनी आँखों में सजाकर सजीव कर देता है जिंदगी की डगर खुशनुमा रहे ,खुद भटक कर कांटे चुन देता है सन्नाटे को आकांषाओं के घूघरुओं की खनक से हर बार भर देता है अच्छाइयों को उजागर करता हुआ, त्रुटियों को अपने में सोख लेता है हर सही में खुलकर ,हर गलत में डरा-डरा,मगर साथ हर हाल में देता है घुप्प अंधेरे में ,मुसीबत में छोड़ता कहाँ? उंगली का नहीं, बाँहों का सहारा देता है मेरी नई पुरानी यादों का पुलिंदा रोज़ ढोता ,इसे बेशकीमती बताता है शब्दों को छोड़ो ,अनकहे इशारे भी पढ़कर मेरा जवाब बन जाता है दूसरे का होता देख नहीं सकता ,पल भर में मेरे बिना मर सा जाता है उसकी न मान किसी और की मानूँ ,तो बोलता ही नहीं, रूठ जाता है आंसुओं की जादुई छुअन दे दूँ ,सीने से लगा लूँ तो झट मान जाता है अपनी खूबसूरती मुझमे छुपा कर मेरा रूप निखार देता है ,मुझे खूबसूरत बना देता है ऐसे दीवाने को कैसे छोड़ दूँ? उससे मुँह कैसे मोड लूँ? उसका विश्वास कैसे तोड़ दूँ? अकेले राह में कैसे छोड़ दूँ? हमसफर, हमराज़, हमदम , कई नामों से इसे पुकारती हूँ इसका असली नाम "कल्पना का मन" है, ये सिर्फ आपको बताया , किसी और को थोड़े ही बताती हूँ?
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पुराना रिश्ता
पुराना रिश्ता आज कई सालों बाद ऐसा नज़ारा हमने साथ देखा रुपहली धूप में असमानी पटल पर बादलों ने उकेरी हुई थी आड़ी-टेढ़ी रेखा मेरी नज़र ने उन में उसका नाम लिखा पाया उसकी नज़र ने मेरे नाम के साथ जुड़ा एक और नाम गिनाया यूं ही पूछ बैठी ऐसा क्यों ? प्राथमिकताएं बदल गई हैं,कब तक कहाँ कुछ रहता ?ज्यों का त्यों कोरे कागज़ पर यूं ही कुछ लिख कर देने का शुरू हुआ खेल नियम वही पुराना ,उठती नज़र भी खानी चाहिए लिखे शब्दों से मेल ये अंदाज़ आज का नहीं ,बरसों पुराना था शायद ऐसे ही हमने एक दूसरे को जाना था मेरे अलफाज सीधे दिल से निकलते हुए,बेखौफ से थे उसके शब्द रुके -रुके ,सोचे समझे ,गैर से थे यूं ही पूछ बैठी ऐसा क्यों ? प्राथमिकताएं बदल गई हैं,कब तक कहाँ कुछ रहता ?ज्यों का त्यों जाने पहचाने मगर अजनबी हो गए रिश्ते को उस पल जिंदगी मिल गयी , जब उसका हाथ थामते ही मेरी लकीरें उसकी लकीरों से जुड़ गयी , मेरे स्पर्श में मजबूत जकड़ थी ,उसकी सिहरन भरी पकड़ थी, मेरे चहरे पर बेइंतेहा खुशी और सुकून था उसके चेहरे में चमक थी पर और भी बहुत कुछ पाने का जुनून था यूं ही पूछ बैठी ऐसा क्यों ? प्राथमिकताएं बदल गई हैं,कब तक कहाँ कुछ रहता ज्यों का त्यो मिले , बिछड़े, फिर मिले ,कहीं फिर न बिछड़ जाएँ , इस खयाल में डूबे डूबे दोनों ने बीते दिनों के किस्से सुनाये मेरी हर बात पर घूम फिर के उसी का जिक्र था , वह तो अपनी ही दुनिया में गुम ,मेरी तरफ से बेफिक्र था यूं ही पूछ बैठी ऐसा क्यों ? प्राथमिकताएं बदल गई हैं,कब तक कहाँ कुछ रहता ?ज्यों का त्यों आज फिर ख्यालों मे डूबी बीती यादों को सहला रही थी रह रह कर उसकी प्राथमिकता वाली बात याद आ रही थी सोच रही थी, बीतते दिनों के साथ फूल ही नहीं, रिश्ते भी ताज़गी खो देते हैं बासी फूलों की भांति,ये रिश्ते भी भीनी महक खो देते हैं मुरझाए फूल कुछ पल रुक कर ,पेड़ की ही जड़ पर फ़ना हो जाते हैं ठीक वैसे ही , मुरझाए बीते रिश्ते भी पुरानी दबी यादों के ढेर मे समा जाते हैं
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मैं आज़ाद कहाँ हुई
मैं आज़ाद कहाँ हुई? माँ के आँचल से उतरकर बस धरा पर पैर रखा ही था , लगा कि मैं आज़ाद हो गयी पिता कि उंगली थामे थामे , अचानक एक दिन अकेले कदम चल पड़े , लगा कि मैं आज़ाद हो गयी पायल की रून-झुन , छुन-छुन गुंजाती आँगन में दौड़ने लगी , लगा कि मैं आज़ाद हो गयी घर का आँगन छोड़ बचपन कभी टिप्परी कभी लुक्काछिप्पी खेलते बिताने लगी , लगा कि मैं आज़ाद हो गयी गुड्डा-गुड्डी स्कूल में संगी साथियों से बदल गए , लगा कि मैं आज़ाद हो गयी पहला अक्षर,पहला शब्द लिखकर पाई शाबाशी से प्रफुल्लित किताबें पढ़ने लगी , लगा कि मैं आज़ाद हो गयी शिक्षा ही नहीं ,संस्कारों के मायने समझने लगी , लगा कि मैं आज़ाद हो गयी माता - पिता की आकांषाओं को आशीर्वाद समझ पूरा करने में सफल रही , लगा कि मैं आज़ाद हो गयी अपनों के सपने मुक्कमिल करती राह में दोस्तों के पंखों ने परवाज़ दी , लगा कि मैं आज़ाद हो गयी दोस्तों की भीड़ में नज़र ने किसी अनोखे को चुन अपनेपन की सौगात दी , लगा कि मैं आज़ाद हो गयी उम्र के इस पड़ाव में मैं किसी उन्मुक्त पंछी सी ,बहती हवा का झोंका बन गयी, लगा कि मैं आज़ाद हो गयी बढ़ते प्रयासों से हर चाहत को मुट्ठी में बंद करने लगी , लगा कि मैं आज़ाद हो गयी नई राह, नए रिश्तों को थामे नई जगह हमसफर संग चली आई , लगा कि मैं आज़ाद हो गयी नया रिश्ता पत्नी का ,नए परिवार में बेटी से बहू बन गयी , लगा कि मैं आज़ाद हो गयी नए घर की अपेक्षा और उन अपेक्षाओं में खरी उतरने लगी , लगा कि मैं आज़ाद हो गयी जिंदगी का चक्र पूरा हुआ जब ममता ने मेरे द्वार दस्तक दी, लगा कि मैं आज़ाद हो गयी बेटी ,पत्नी ,बहू ,बहन जैसे कई रिश्तों को सींचते सींचते मैं माँ बन गयी, लगा कि मैं आज़ाद हो गयी माँ और माँ का कर्तव्य इस अंतर को पाटते-पाटते वर्षों बीत गए लगा कि मैं आज़ाद हो गयी बदलता समय , बढ़ता परिवार ,बढ़ती जरूरतें सब मनचाहा पाने लगी, लगा कि मैं आज़ाद हो गयी इतने सालों से....... घर में, नौकरी में, रिश्तों में, दोस्तों में बंटने लगी ,खुद को बाँटने लगी अब लगने लगा क्या मैं वाकई आज़ाद हो गयी? आधी उम्र बीत गयी ,आधी रह गयी शायद अपेक्षा,आकांषा,जिम्मा सब बढ़ ही रहा है शायद खुद को भुला वक़्त की बयार के संग बहती गयी शायद घुटन ,जकड़न ,थकान को न्योता दे दिया है शायद आज़ाद हो गयी ,आज़ाद हो गयी सोचते -सोचते आज़ादी के मायने भूल गयी शायद कौन सी आज़ादी ? कैसी आज़ादी ? किस से आज़ादी ? इसी असमंजस में डूबी आज़ाद कल्पना को ढूंदना चाहूंगी एक दिन शायद
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वह हर दिन
वह हर दिन जिंदगी हर दिन नई करवट लेती है कभी खुशी ,कभी गम की आहट देती है होठों पर कभी ढेर हंसी , कभी हल्की मुस्कुराहट होती है माथे पर कभी वाकई , कभी बेवजह सलवट होती है वह हर दिन बोझ सा , जब अंजाम में रुकावट होती है वह हर दिन त्योहार सा ,जब थोड़ा करने पर सफलता झटपट होती है वह हर दिन मायूस सा ,जब रिश्तों में खटपट होती है वह हर दिन इम्तिहान सा ,जब यारों में हट –हट होती है वह हर दिन बहार सा ,जब पुराने अहसासों को ताजगी की रुहानीयत होती है वह हर दिन पाकीज़ सा ,जब सब कुछ कुर्बान करने की हैसियत होती है वह हर दिन नापाक सा ,जब गैर हो या अपना ,छलने की नीयत होती है वह हर दिन साज़िश सा ,जब झूठा ठहराया जाय ,वो जो असलियत होती है वह हर दिन बुलबुला सा ,जब चंद पल चुरा कर अपनों को देने की सहूलियत होती है वह हर दिन इंद्रधनुष सा ,जब यादों के धुंधले रंगों से पुरानी तस्वीर रंगने की फुर्सत होती है वह हर दिन अंगारे सा ,जब उन जिगर के टुकड़ों से किसी के भी छूटने से दहशत होती है वह हर दिन उधार सा, जब वही वही फिर फिर करने से बोरियत होती है वह हर दिन सुकून सा, जब खुद को ढूंढ कर ,खुद से बातें कर लें ,ऐसी तबीयत होती है वह हर दिन सफल सा ,जब हाथ रखते ही मिट्टी सोना और जीत सिर्फ हमारे नाम वसीयत होती है वह हर दिन तन्हा सा ,जब दिल में अंधेरा और वक़्त की हमें उजाड़ने की क़ुव्वत होती है वह हर दिन तजुर्बे सा ,जब दूसरों की गलतियों का ठीकरा अपने सर फूटने से फजीहत होती है वह हर दिन बचपन सा, जब बच्चों संग शरारतों में उतर ,दिल में उनकी सी मासूमियत होती है वह हर दिन आशीर्वाद सा ,जब दो पल ईश्वर और माँ-बाप दोनों के चरणों की इबादत होती है सबका अलग दिन अलग आज अलग सुर अलग साज अलग पहल अलग आगाज अलग उम्मीद अलग परवाज़ जीने का अलग अलग अंदाज़ हर दिन –हर दिन कर रोज जान रहे हैं हम इस छोटी सी जिंदगी के बड़े बड़े राज़
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इक बूंद इक बूंद नज़र मिली
इक बूंद इक बूंद नज़र मिली, मैं खूबसूरत हो गयी इक बूंद वफा मिली, मैं तेरी ओर खिंच गयी इक बूंद अल्फ़ाज़ मिले, मैं तेरी कायल हो गयी इक बूंद इकरार मिला, मैं बांवरी रूमानी हो गयी इक बूंद एहसास मिला, मैं जीती जागती दीवानी हो गयी इक बूंद मुस्कान मिली , मैं खुशियों की आदी हो गयी इक बूंद स्पर्श मिला, मैं जन्नत सी रूहानी हो गयी इक बूंद तड़प मिली, मैं मोम से पानी हो गयी इक बूंद दुआ मिली, मैं खुशकिस्मती की निशानी हो गयी इक बूंद शरारत मिली, मैं भी न जाने क्या-क्या कह गयी इक बूंद पनाह मिली, मैं वक़्त थामे वहीं बस गयी इक बूंद आगोश मिला, मैं घुलते घुलते तुझमे समां गयी इक बूंद धड़कन मिली, मैं बस वहीं बुत बन गयी इक बूंद इश्क़ मिला, मैं क्या से क्या हो गयी इक बूंद तू मिला, मैं कहाँ रही ?न जाने कब की तुझ पर फ़ना हो गयी बूंद -बूंद से सजा ये रिश्ता हर बूंद से पनपा ये रिश्ता बस एक बूंद में सिमटा ये रिश्ता पर बूंद का नहीं सागर सी गहराइयों का वजूद लिए ये तेरा-मेरा रिश्ता
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आज मेरा शहर बिजली में नहा रहा है
आज मेरा शहर बिजली में नहा रहा है , हर घर नया सा चमचमा रहा है , अपना आँगन हर कोई सजा रहा है , मन कितनों ने बुहारा इस बार ? प्रश्न हर वर्ष का आज भी सता रहा है रिश्तों को तोहफा सहला रहा है , कोई कुछ भी नहीं ,कोई कितना कुछ पा रहा है अपनी लक्ष्मी हर कोई दूसरे से छिपा रहा है , त्यौहार या तृष्णा का कारोबार ? प्रश्न हर वर्ष का आज भी सता रहा है किसी का आम दिन ,कोई लाखों उड़ा रहा है कोई सिर्फ उम्मीद ,कोई ऐश्वर्य दिखा रहा है चकाचौंध चंहु ओर सही , मन के लिए इक मिटटी का दीया क्यों नहीं? प्रश्न हर वर्ष का आज भी सता रहा है कागज़ में रौशनी संग आवाज़ बाँध रहा है , खुद आग है और धमाका मांग रहा है , खुशियां फैला ,विष नहीं आग पटाखों को क्यों ?नोटों में क्यों नहीं ? प्रश्न हर वर्ष का आज भी सता रहा है
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नव वर्ष बुला रहा है
नव वर्ष बुला रहा है .......... हाथों की लकीरें इधर उधर कर दूँ पर खोलूं फिर पैर इस पंछी को छु मंतर कर दूँ इस बार उडून बादलों में घर कर लूँ नव वर्ष बुला रहा है कुछ नया कर लूँ नंगे पाँव दौडूँ उस धनुक से तक़दीर रंग दूँ धूल उड़ा दूँ हर ख्वाब नया कर दूँ बदलूं इस क़द्र की जाने क्या कुछ कर लूँ अंधियारा पी लूँ सब जगमग लूँ नव वर्ष बुला रहा है कुछ नया कर लूँ बस खुशियां बिछा दूँ सबके गम ढंका दूँ कल का आसमा रंग दूं आज को रंगोली बना दूँ इस हथेली सुकून का चाँद उस हथेली खुशहाली का सूरज गढ़हा दूँ मुट्ठी खोलूं जब भी सबको नव वर्ष का तोहफा बढा दूँ Happy new year in advance to all my near and dear ones . May god bless us all .
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तन्हाई
तन्हाई...... लगा न था यूँ दूर निकल जायेंगे क़दमों के निशान खुद बखुद पुछते चले जायेंगे रिश्ते हों या यादें दस्तक दें भी तो कैसे ? खुद भटक रहा हूँ एक बैरंग लिफाफा जैसे लगा न था यूँ दूर निकल जायेंगे जीतते रहे इश्क में मौत से हार जायेंगे अब भी लुटने की ख्वाइश दबाये कब्र में लेटे हैं ऐसे में क्या मांग लेंगे वो हमसे?
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काश
काश …………………. काश……… तू सीप ,मैं मोती होती , तेरे आगोश में पनपती ,खूब चमकती मेरी नजर में तू , और तेरी नज़र सिर्फ मुझ पर पड़ती सारे जहाँ से छिपी – छिपी, मेरी चमक सिर्फ तेरी होती काश ……….. तू पर्वत ,मैं तुझसे निकलती धारा होती जिंदगी की ऊँची -नीची डगर में तेरा साथ देती तू रोकता ………….रुक जाती ,बह जा कहता …….. बह जाती बादल बन तुझ पर बरसने फिर लौट आती बता? तुझ से जुदा कैसे रह पाती? काश ………तू इन्द्रधनुष ,मैं तुझमें भरा रंग होती तू खूबसूरत ,मैं तेरी खूबसूरती की वजह होती तेरी सुन्दरता में ,मैं खुद को रंगीन पाती जब तू मिटता ,मैं भी अपने रंगों को आसमां से पोंछ देती काश …….. तू सागर ,मैं तुझसे उठती लहर होती तू पानी से ,पर मैं तो सिर्फ तुझसे बनती ताउम्र तुझसे उठती और हर बार तुझमें डूब जाती तू मुस्कुराता तो लहर रहती ,नाराज़ हो जाता तो तूफ़ान ला देती काश ……. तू हिरन , मैं कस्तूरी होती तुझ में कैद रहती ,हमेशा समाये रहती अपनी खुशबु से तुझे सरोबार रखती वजह मैं होती ,पर दुनिया तेरी दीवानी होती काश……तू पेड़ ,मैं तुझसे लिपटी बेल होती तेरा सहारा लिए बढती जाती तेरे साथ तेरी ऊँचाइयों की साक्षी कहलाती काट देता,अलग करता कोई अगर,जीती कहाँ ?विरह में सुख जाती काश ……….तू किताब ,मैं उसमे लिखे शब्द होती शुरू से आखरी’पन्ने में ,मैं ,सिर्फ मैं होती तुझे कायम करने में, मैं खुद को बिछा देती मान न मान ,मैं न होती तो तेरी रचना कहाँ से होती काश …….तू सिर्फ तू ,मैं तेरी परछाई होती दिन भर तेरे आगे -पीछे डोलती रात को तेरे संग सो जाती फिर अगली सुबह सब कुछ छोड तेरे संग हो जाती
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हक़दार ख्वाबों से सजे अर्श पर
हक़दार ख्वाबों से सजे अर्श पर लेटे लेटे फर्श पर दोस्तों ने बादलों को पढ़ा आफताब उसे मुझे एक खंजर दिखा जाने कब लकीरें उलझ गयी जाने कब दोस्ती झुलस गयी हक़दार तेरी दोस्ती के हम भी तो शायद कभी थे , शायद नहीं थे ख्वाबों से सजे अर्श पर लेटे लेटे फर्श पर मुहब्बत ने बादलों को पढ़ा मुझे पूनम का उसे ईद का चाँद दिखा मैं शर्म में बुत बन गयी वो धर्म में ताबूत बन गया हक़दार तेरी मुहब्बत के हम भी तो थे शायद कभी थे , शायद नहीं थे
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कुछ कर दिखाओ
कुछ कर दिखाओ....... किस शाख पर टंगा है खुशहाली का सपना तेरा मेरा नहीं हम सब का अपना उस साख को हिलाओ पत्तों पर पड़ी बूंदों को हथेली पर जमाओ हर ओस को आस बनाओ हर आस को विश्वाश बनाओ किस अर्श पर खीचीं हैं उमीदों की तरंगे तेरी मेरी नहीं हम सबकी उमंगें इन तरंगों को इकठा कर लाओ अद्भुत सी इक धुन बनाओ साज़ ना सही संग ही गाओ आज नया इक राग बनाओ
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कई दिन हुए
कई दिन हुए ......... कई दिन हुए ...... वक़्त गीला सा है , फिसल नहीं रहा मन जमा सा है , पिघल नहीं रहा नकाब ओढ़ा सा है , ढल नहीं रहा जवाब दिया सा है , हल नहीं रहा इश्क जर्रा सा है , महल नहीं रहा दर्द असल सा है , नक़ल नहीं रहा रिश्ता रूठा सा है , संभल नहीं रहा आंसू टंगा सा है , टहल नहीं रहा साथी तिनका सा है , संदल नहीं रहा ख़याल उतरन सा है , पहल नहीं रहा अंदाज़ रुखा सा है , ग़ज़ल नहीं रहा जिस्म टूटा सा है , चल नहीं रहा वो खफा सा है , बहल नहीं रहा लम्हा चिपका सा है , बदल नहीं रहा कई दिन हुए .....
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कारीगरी … क़्या बनाऊं
कारीगरी … क़्या बनाऊं ? ख्वाइशों की कूची में ताबीर का रंग भर दूँ इक तस्वीर बनाऊं जज़्बात की मिटटी को दीवानगी से मल लूँ इक बुत बनाऊं मुहब्बत के सुर को उल्फत से कस लूँ इक राग बनाऊं इंतज़ार के संदल को बेकरारी से तराश लूँ इक झरोखा बनाऊं सुलगते अरमान को कशिश से बाँध लूँ इक गुलदस्ता बनाऊं हुस्न पर कभी अदा कभी हया टांक लूँ इक लिबास बनाऊं इश्क की कलम को रूह में भिगो लूँ इक ग़ज़ल बनाऊं अपने "मैं "को तुम्हारे "तुम " में घोल लूँ इक "हम "बनाऊं दम भर बैठो तो सही कल्पना संग देखो ,मैं और क्या क्या बनाऊं ?
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हर बार .......बस
हर बार .......बस...... हर बार तेरा सच सच्चा नहीं होता बातों में दिल झूलता तो है बस बच्चा नहीं होता हर बार तेरी चुप्पी चुप नहीं होती तन्हाई में चीखती है अंधेरों सी बस घुप्प नहीं होती हर बार तेरी नज़र नजरिया नहीं होती दिल को छूने की खूबसूरती ही बस इक जरिया नहीं होती
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आप से तुम हुए ...........फिर गुम हो गए
आप से तुम हुए ...........फिर गुम हो गए .... मुद्दतों बाद ......आज मिले लफ़्ज़ों ने कहा आप कहाँ खो गए ? नज़रों ने कहा आप बूढ़े हो गए दिमाग ने कहा अब तक कहाँ रह गए ? जिगर बेसब्र खीज के बोला .... कबख्तों चुप हो जाओ हमें अकेला छोड़ दो हम हम उम्र हो गए .
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हम इस गुरुर में थे
हम इस गुरुर में थे ..... की हमने वक़्त बदल लिया किवाड़ धकेलता वक़्त बाहर निकल आया अंगड़ाई लेता बुदबुदाया जरा जाकर आइना तो देख पहला कैसा लगता था , अब कैसा हो गया ?
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होली में
होली में ....,,, आओ थोडा द्वेष धुला लो मल मल सारा क्लेश धुला लो होली में पिचकारी में जीवन भर लो ख्वाबों की बौछार लगाओ होली में खुशियों का टीका लगवा लो मांग सुकून पिया से भरा लो होली में गुब्बारों में मुस्कानें भर लो कस कस सब पे आज मारो होली में भंग न पीओ मस्ती पीलो उमंगों के पकोड़े खा लो होली में जज़बातों की गुझिया तल लो एक नहीं दो चार खिला लो होली में हाथों में विशवास लगा लो मुख पर सबके खूब लगा लो होली में मुस्कानों की हौदी भर लो सभी ग़मों को धक्का मारो होली में
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क्या हुआ गर
क्या हुआ गर ....... दिल तक पहुँचने का रास्ता लम्बा है दिलबर ? सुकून से वक़्त लगाता हुआ आ इस क़द्र खुद को थकाता हुआ आ राह को पनाह से मिलाता हुआ आ वापसी की गुंजाईश मिटाता हुआ आ मेरे नाम को नया पता लिखाता हुआ आ यहीं मिलूंगा ,ऐसी रट लगाता हुआ आ आखरी सफ़र में हूँ सब को फक्र से बताता हुआ आ गम ना कर........ कम समय में दिल में उतरने वाले लोग कम समय में दिल से उतर भी जाते हैं
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पहले नींद ले चुका .....अब ख्वाब मांगता है
पहले नींद ले चुका .....अब ख्वाब मांगता है बूँद बूँद निचुड़ गयी ...अब वो बरसात मांगता है छल जाती हूँ ,छलती नहीं ......सादगी है दिल हर बार ......नयी खुराफात मांगता है हर पल धड़कता है ......दिल ठिठकता नहीं बस उसे देख रुकने के..... चंद लम्हात मांगता है दिल उड़ेल दिया ......जिगर खाली है इश्क़ा है ....रत्ती भर जज़्बात और मांगता है
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बिटिया की व्यथा
बिटिया की व्यथा....... "नाते "- "ताने "में बंधी मेरी पतंग बताओ कैसे उड़ाउँ ? जरा ढील तो दे दुनिया देखो मैं "यूँ "आसमान छू आऊँ
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काश मेरे लिखे लफ़्ज़ों में वो स्पर्श आ जाये
काश मेरे लिखे लफ़्ज़ों में वो स्पर्श आ जाये अनमना भी पढता हुआ दिल तक सहर्ष आ जाये उड़ते एहसासों की बस कलम को दर्श आ जाए लिखूं जब भी कुछ ख़ास जमीं पे अर्श आ जाये
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मसरूफ रहिये ........ऊबिये मत
मसरूफ रहिये ........ऊबिये मत सोने की चमक में ....डूबिये मत ऊबे हुए सुखी भी दीखते हैं राह में क्या रखा है ? पाकर सब भी घुटने की चाह में
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गर थोड़े में ही मिल रहा सुकून है
गर थोड़े में ही मिल रहा सुकून है अर्श छूने की जिद्द अब ना पाली जायेगी आस संग आंसूं मिला के भेजी है इक यही अर्ज़ खुदा से ना टाली जायेगी अदा से लद गए ,तेरा इश्क पहने बैठे हैं आज ईद हमारी भी ना खाली जायेगी इश्क से थकता नहीं ,स्याह हो रहा हूँ फख्र है ,उफ़ अब भी ना निकाली जायेगी बेइन्तेहाँ रुस्वाई कमाई है मैंने उम्र भर इश्क पे अब कत्तई नज़र ना डाली जायेगी
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तमन्नाओं का ज़ख़्मी हूँ या
तमन्नाओं का ज़ख़्मी हूँ या ज़ख्मों की तमन्ना है मैं इश्क में हूँ ........
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ये नैनों की क्या साजिश है
ये नैनों की क्या साजिश है ? ये बादलों की क्या नादानी है ? मुझ से तो बरस रही बारिश है उससे जो निकल रहा पानी है
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गर "मैं "को "तुम "की फ़िक्र हो जाये
गर "मैं "को "तुम "की फ़िक्र हो जाये "तुम "को "मैं "पर फक्र हो जाये खुदा कसम ....."हम" रिश्तों के बादशाह हो जाएँ
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दिल चाहे भरा हो ,इक कोना तो खाली है
दिल चाहे भरा हो ,इक कोना तो खाली है जहाँ तूने याद को ,सलीके से धरा होगा बेशक तू मशहूर है लूटने के फन में मुझे तो वही पायेगा ,जो मुझसा खरा होगा वीरानियों से ऊब गयी ,नया घर चाहिए सिर्फ एक कमरा ,जो दोस्तों से भरा होगा इस आस से माँ ने ,सींचे रखा था ठूँठ पोंधा छाँव ना दे ,लगाव ही देगा ,जब भी हरा होगा अपने से कहते रहे ,बस अपनी ही सुनते रहे कुछ इशारा तो ,गूंगी तन्हाई ने भी करा होगा मुहब्बत का शायर है वो ,बस नाम भर का इश्क उसका तो ,हर ग़ज़ल के साथ मरा होगा
