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रचना 0015

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आज मेरा शहर बिजली में नहा रहा है

आज मेरा शहर बिजली में नहा रहा है , हर घर नया सा चमचमा रहा है , अपना आँगन हर कोई सजा रहा है , मन कितनों ने बुहारा इस बार ? प्रश्न हर वर्ष का आज भी सता रहा है रिश्तों को तोहफा सहला रहा है , कोई कुछ भी नहीं ,कोई कितना कुछ पा रहा है अपनी लक्ष्मी हर कोई दूसरे से छिपा रहा है , त्यौहार या तृष्णा का कारोबार ? प्रश्न हर वर्ष का आज भी सता रहा है किसी का आम दिन ,कोई लाखों उड़ा रहा है कोई सिर्फ उम्मीद ,कोई ऐश्वर्य दिखा रहा है चकाचौंध चंहु ओर सही , मन के लिए इक मिटटी का दीया क्यों नहीं? प्रश्न हर वर्ष का आज भी सता रहा है कागज़ में रौशनी संग आवाज़ बाँध रहा है , खुद आग है और धमाका मांग रहा है , खुशियां फैला ,विष नहीं आग पटाखों को क्यों ?नोटों में क्यों नहीं ? प्रश्न हर वर्ष का आज भी सता रहा है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें