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प्रकृति की अनोखी सीख ,मिली सोलह जून की तारीख

प्रकृति की अनोखी सीख ,मिली सोलह जून की तारीख उत्तर में बसा खूबसूरत अंचल, उत्तरांचल बना सबके मन ने विकास और प्रकृति को जोड़ने का सपना बुना देवों की भूमि का प्राकृतिक सौन्दर्य, नई पहचान पा बढ़ा कई गुना नई सोच और पहाड़ी युवा ने भी इसे अपनी नई कर्मभूमि चुना खुला विकास का द्वार,सड़क और रोजगार से जुड़ गए गाँव जो थे दूर-दराज हर पहाड़ी प्रसन्नचित, आतुर था पहने के लिए विजयी ताज अभी बस पंखों ने भरी ही थी परवाज़, की उत्तरांचल को उत्तरांखण्ड बनाने का हो गया आगाज नाम ही नहीं ,पहाड़ का स्वरूप बदला, बदल गए रीति-रिवाज कभी विकास, कभी संस्कृति , कभी राजनीति के नाम पर नोचने का ,नया नहीं बहुत पुराना था अंदाज़ देव भूमि में उन्नति के नाम पर हर नियम किया गया नज़रअंदाज़ ताक पर रखी हरियाली चुन्नर,लूटी हर किसी ने पहाड़ी फिजा की लाज़ रुका न कोई, अमीर हो या गरीब,नेता हो या जनता,बन बैठा हर कोई यमराज पहाड़ भी सहते जा रहे थे, पड़ रही थी उन पर अलग विकसित प्रदेश बनने की गाज़ कभी इन्हें भी था अपनी नायाब स्वछता ,सुंदरता , स्थिरता पर नाज़ मन मे छुपाए जा रहे थे, स्वार्थी मनुष्य के उससे भी स्वार्थी राज़ इमारत पर इमारत,घर के ऊपर और बड़ा घर ,राज्य निर्माण कहाँ?स्वनिर्माण मे लगे उत्तराखंडी नहीं आ रहे थे बाज़ नित नए पहाड़ों को चीर फाड़ ,नदी को बांध कर सड़क -पुल बनाने का अपना लिया नया काज पहाड़ी कुदरत भी कब तक सहती, ऐसे मदमस्तों का बेतुका मिजाज? चुप्पी साधे , इकटक घूरती रहती ,कभी मनुष्य , कभी भगवान को जो ऊंचाइयों पे बैठे थे विराज कभी होले ,कभी ज़ोर से करती रहती थी इशारे , सुनता कौन? इसकी आवाज कब तक अकेले पानी मे तिनके की तरह तैरती? जब डुबाने को आतुर हो आंकांक्षाओं से भरा पहाड़ी जहाज़ आज तो हद्द हो गयी ,शोषण की इंतेहा हो गयी सदा चुप रहने वाली कुदरत फूट-फूट खूब रोई देवभूमि के देवों से न्याय की गुहार लगाई अपने पर,अपनों से हुए अत्याचार की व्यथा सुनाई मनुष्य का दिया एक –एक जख्म ,एक –एक घाव ,खरोंच तक दिखाई हमेशा मूक रही प्रकृति ने, भगवान से अपनी आवाज़ बनने की अर्जी लगाई भगवान ने भी अपने दरबार मेँ ,कुदरत और मानव की अदालत लगाई प्रकृति को हर मोड पर कर्तव्यपरायण, उदार पाकर, मानव को स्वार्थी तथा भोगी होने की फटकार लगाई जैसे को तैसा........भगवान ने प्रकृति को मनमर्जी करने और मानव को उसे सहने की सज़ा सुनाई 16 जून को पहाड़ी प्रकृति हमारी सज़ा हम पर अमल लाई भगवान के समक्ष ही कुदरत वेग,वर्षा,बाढ़ मिट्टी ,पत्थर से लैस हो आई चंडिका बन हर निवासी ,हर घर की नींव हिलाई बरसों से दबे उदगार को बहते पानी के रूप मे लाई कोई न बचा,भक्त ,निवासी या पर्यटक ,सबको प्रचंड लीला दिखाई धारा रह गया विकास, बह गयी कमाई याद रखेगा मानव यह सीख जो प्रकृति ने झकझोर कर सिखाई भगवान के नाम पर कुदरत इस बार फिर भी शांत हो गयी उत्तरांचल आधा छोड़ , आधा बहा ले गयी हमारी गलतियों को गिना कर हमें दोषी बता गयी आगे भी बहुत कुछ कर सकती है ,इसका मंजर दिखा गयी निर्जीव होकर भी जीवित मनुष्य को अंगूठा दिखा गयी अभी भी सुधार जाओ ! पहले प्यार से, अब बौखलाकर समझा गयी बचे हुए खंडों को जोड़, उत्तराखंड फिर बन जाएगा पाप का घड़ा फूट गया पर, प्रयासों से नया आ जाएगा दिलो-दिमाग के जख्मों को ,मानवता का मलहम लग जाएगा मंदिर ही नहीं ,हर उजड़ा कोना फिर बस जाएगा पर क्या इसमे बसने वाला हर शक्स अपनी गलतियों से कुछ सीख पाएगा? अपने उत्तरांचल के लिए कुछ कर पाएगा?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें