कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0007

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काश

काश ...................... काश......... तू सीप ,मैं मोती होती , तेरे आगोश में पनपती ,खूब चमकती मेरी नजर में तू , और तेरी नज़र सिर्फ मुझ पर पड़ती सारे जहाँ से छिपी - छिपी, मेरी चमक सिर्फ तेरी होती काश …........ तू पर्वत ,मैं तुझसे निकलती धारा होती जिंदगी की ऊँची -नीची डगर में तेरा साथ देती तू रोकता .............रुक जाती ,बह जा कहता ........ बह जाती बादल बन तुझ पर बरसने फिर लौट आती बता? तुझ से जुदा कैसे रह पाती? काश .........तू इन्द्रधनुष ,मैं तुझमें भरा रंग होती तू खूबसूरत ,मैं तेरी खूबसूरती की वजह होती तेरी सुन्दरता में ,मैं खुद को रंगीन पाती जब तू मिटता ,मैं भी अपने रंगों को आसमां से पोंछ देती काश ........ तू सागर ,मैं तुझसे उठती लहर होती तू पानी से ,पर मैं तो सिर्फ तुझसे बनती ताउम्र तुझसे उठती और हर बार तुझमें डूब जाती तू मुस्कुराता तो लहर रहती ,नाराज़ हो जाता तो तूफ़ान ला देती काश ....... तू हिरन , मैं कस्तूरी होती तुझ में कैद रहती ,हमेशा समाये रहती अपनी खुशबु से तुझे सरोबार रखती वजह मैं होती ,पर दुनिया तेरी दीवानी होती काश…...तू पेड़ ,मैं तुझसे लिपटी बेल होती तेरा सहारा लिए बढती जाती तेरे साथ तेरी ऊँचाइयों की साक्षी कहलाती काट देता,अलग करता कोई अगर,जीती कहाँ ?विरह में सुख जाती काश ….......तू किताब ,मैं उसमे लिखे शब्द होती शुरू से आखरी'पन्ने में ,मैं ,सिर्फ मैं होती तुझे कायम करने में, मैं खुद को बिछा देती मान न मान ,मैं न होती तो तेरी रचना कहाँ से होती काश .......तू सिर्फ तू ,मैं तेरी परछाई होती दिन भर तेरे आगे -पीछे डोलती रात को तेरे संग सो जाती फिर अगली सुबह सब कुछ छोड तेरे संग हो जाती मैं तो तेरे लिए ,कभी ये कभी वोह होती काश तुझे भी मेरे होने न होने की फिक्र होती कभी सोचती हूँ वोह ही क्यों आगे और मैं उसके पीछे होती आज भी हम साथ होते अगर उसे मेरे कुछ भी होने की क़द्र होती
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें