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रचना 0025

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हम इस गुरुर में थे

हम इस गुरुर में थे ..... की हमने वक़्त बदल लिया किवाड़ धकेलता वक़्त बाहर निकल आया अंगड़ाई लेता बुदबुदाया जरा जाकर आइना तो देख पहला कैसा लगता था , अब कैसा हो गया ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें