भाषा / Language
हक़दार ख्वाबों से सजे अर्श पर
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हक़दार
ख्वाबों से सजे अर्श पर
लेटे लेटे फर्श पर
दोस्तों ने बादलों को पढ़ा
आफताब उसे
मुझे एक खंजर दिखा
जाने कब लकीरें उलझ गयी
जाने कब दोस्ती झुलस गयी
हक़दार तेरी दोस्ती के
हम भी तो
शायद कभी थे ,
शायद नहीं थे
ख्वाबों से सजे अर्श पर
लेटे लेटे फर्श पर
मुहब्बत ने बादलों को पढ़ा
मुझे पूनम का
उसे ईद का चाँद दिखा
मैं शर्म में बुत बन गयी
वो धर्म में ताबूत बन गया
हक़दार तेरी मुहब्बत के
हम भी तो थे
शायद कभी थे ,
शायद नहीं थे
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें