भाषा / Language
कई दिन हुए
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कई दिन हुए .........
कई दिन हुए ......
वक़्त गीला सा है ,
फिसल नहीं रहा
मन जमा सा है ,
पिघल नहीं रहा
नकाब ओढ़ा सा है ,
ढल नहीं रहा
जवाब दिया सा है ,
हल नहीं रहा
इश्क जर्रा सा है ,
महल नहीं रहा
दर्द असल सा है ,
नक़ल नहीं रहा
रिश्ता रूठा सा है ,
संभल नहीं रहा
आंसू टंगा सा है ,
टहल नहीं रहा
साथी तिनका सा है ,
संदल नहीं रहा
ख़याल उतरन सा है ,
पहल नहीं रहा
अंदाज़ रुखा सा है ,
ग़ज़ल नहीं रहा
जिस्म टूटा सा है ,
चल नहीं रहा
वो खफा सा है ,
बहल नहीं रहा
लम्हा चिपका सा है ,
बदल नहीं रहा
कई दिन हुए .....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें