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रचना 0003

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यहाँ कुछ टिकता क्यों नहीं

यहाँ कुछ टिकता क्यों नहीं? टिकती नहीं सफलता, पाते ही बढ़ जाती है और पाने की मानसिकता टिकता नहीं विश्वास, दोनों में से एक है, दगाबाज़ टिकता नहीं भाईचारा, उफ़ ये सोच ....इतना सा मेरा ,तेरा क्यों है इतना सारा ? टिकती नहीं मुहब्बत , असमंजस में है, रिश्ता अपनाऊ या दौलत ? टिकता नहीं वादा, स्वार्थी फितरत है, जरूरत से ज्यादा टिकती नहीं नज़र , आज है झुकी ,कल देखेगी ऊँचाइयों का पहला प्रहर टिकती नहीं घडी की सुइयाँ , एक लाती है गम, दूसरी देती है खुशियाँ टिकती नहीं दोस्ती , सहना तो दूर ,देख भी नहीं सकती यार की उन्नति टिकती नहीं मुस्कान , होठों पर धरता कम ,छीन ता ज्यादा है इंसान टिकता नहीं रिश्ता , समय के साथ पकता जाता ,उम्र के साथ झड जाता टिकती नहीं जवानी चढ़ती सूरज की तरह, सूखती जैसे मरू में पानी टिकते नहीं आंसू, बहते ख़ुशी में और तब भी जब मैं उदास हूँ टिकती नहीं दौलत , आज है बेशुमार ,जाने कब पलट जाये किस्मत टिकती नहीं जीत , विजयी आज तू है ,कल किसी और की होगी जीत टिकती नहीं हार, अभी हूँ पस्त लाचार ,कल करूंगा संभल कर वार टिकती नहीं यादें , परत दर परत बिछती जाती ,कब तक इसको लादें? टिकती नहीं आदत , नयी लगते ही, पुरानी की हो जाती सहादत टिकता नहीं ईमान , है बहुत सस्ता ,खरीदता -बेचता इंसान टिकती नहीं जुबान , फिसल -फिसल कर अब बची कहाँ इसकी पहचान? टिकती नहीं प्रार्थना, आज इसके लिए ,कल उसके लिए ,भगवान् बदल बदल होती याचना टिकते नहीं जज़्बात , प्रेमवश नहीं, आवश्यकता वश निभाते एक दूसरे का साथ टिकती नहीं शर्म , पहले आँखों में थी,अब बची भी है? होता इसका भ्रम टिकती नहीं इच्छा , दिमाग कहे यही अच्छा ,मन मांगे उससे कई गुना और अच्छा टिकता नहीं वजूद , जीवन भर कायम ,मृतक का नहीं कही मौजूद और भी कई चीजें हैं जो टिकती नहीं , मेरी सोच और कलम भी टिकती नहीं , क्या आपको भी ऐसा सब लगता नहीं , आस पास ऐसा सब दिखता नहीं? इसी लिए तो कहती हूँ यहाँ कुछ टिकता नहीं टिकता है, तो रुकता नहीं !
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें