भाषा / Language
मेरा दीवाना
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मेरा दीवाना
ये मेरा कैसा दीवाना है?
जो मुझे पागलों सा चाहता है ,
मेरे रोम-रोम को पहचानता है,
हर सांस में बस मेरा नाम लेता है,
मेरे स्पर्श को महसूस करना हक़ समझता है,
रात -दिन मेरे ख्यालों में कभी गुम, कभी डूबा ,कभी खो भी जाता है,
अपनी पहचान को भूल ,मुझे अपना साया बताता है,
हसीन नज़ारों पर नहीं, अपनी नज़र सिर्फ मुझ पर रखता है,
मेरे साथ बीते किसी भी पल को ज़ाया नहीं करता है,
मेरी या मुझ तक आती कोई भी आवाज सबसे पहले सुनता है
क्या सोचती हूँ ,क्या चाहती हूँ ?बांवरा पलक झपकते ही समझ जाता है
मेरी ऊमीदों में नितनए रंग भरकर हमेशा कुछ हासिल करने का होंसला भरता है
मेरे प्रयासो को हाथ पकड़ कर ऊंचे और ऊंचे आयामों को छूआता है
ख्वाइशों की फेरहिस्त चाहे कितनी लंबी हो,माथे पे शिकन नहीं लाता है
मेरी हर चाहत को अढ्भुत मान कर जमीन आसमान एक कर देता है
मेरे रंग में रंगा हुआ नायाब दुनिया की चमक को खारिज कर देता है
नाम मेरा ,पहचान मेरी ,इन दोनों को बनाने में अपना सर्वस्व लुटाता है
जमाने भर के दुख और निराशा के बढ़ते कदम वहीं छाँट कर छोटे कर देता है
कुदरत की हर खूबसूरत चीज़ मेरी हो जाए ऐसी कामना करता है,
मुझे मुसकुराता देखने के लिए खुशियों में लिपटा तोहफा मुझे रोज़ देता है
मुकाबला कैसा भी हो ,हर हाल में मेरी जीत निश्चित चाहता है
मेरे हर रूप को अपनाता हुआ ,मेरे स्वाभिमान को मान देता है
मेरी हर पसंद को चूमता,हर नापसंद को नकार कर आगे बढ़ जाता है
मेरे सपनों को अपनी आँखों में सजाकर सजीव कर देता है
जिंदगी की डगर खुशनुमा रहे ,खुद भटक कर कांटे चुन देता है
सन्नाटे को आकांषाओं के घूघरुओं की खनक से हर बार भर देता है
अच्छाइयों को उजागर करता हुआ, त्रुटियों को अपने में सोख लेता है
हर सही में खुलकर ,हर गलत में डरा-डरा,मगर साथ हर हाल में देता है
घुप्प अंधेरे में ,मुसीबत में छोड़ता कहाँ? उंगली का नहीं, बाँहों का सहारा देता है
मेरी नई पुरानी यादों का पुलिंदा रोज़ ढोता ,इसे बेशकीमती बताता है
शब्दों को छोड़ो ,अनकहे इशारे भी पढ़कर मेरा जवाब बन जाता है
दूसरे का होता देख नहीं सकता ,पल भर में मेरे बिना मर सा जाता है
उसकी न मान किसी और की मानूँ ,तो बोलता ही नहीं, रूठ जाता है
आंसुओं की जादुई छुअन दे दूँ ,सीने से लगा लूँ तो झट मान जाता है
अपनी खूबसूरती मुझमे छुपा कर मेरा रूप निखार देता है ,मुझे खूबसूरत बना देता है
ऐसे दीवाने को कैसे छोड़ दूँ?
उससे मुँह कैसे मोड लूँ?
उसका विश्वास कैसे तोड़ दूँ?
अकेले राह में कैसे छोड़ दूँ?
हमसफर,
हमराज़,
हमदम ,
कई नामों से इसे पुकारती हूँ
इसका असली नाम "कल्पना का मन" है,
ये सिर्फ आपको बताया ,
किसी और को थोड़े ही बताती हूँ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें