कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 0032

भाषा / Language

गर थोड़े में ही मिल रहा सुकून है

गर थोड़े में ही मिल रहा सुकून है अर्श छूने की जिद्द अब ना पाली जायेगी आस संग आंसूं मिला के भेजी है इक यही अर्ज़ खुदा से ना टाली जायेगी अदा से लद गए ,तेरा इश्क पहने बैठे हैं आज ईद हमारी भी ना खाली जायेगी इश्क से थकता नहीं ,स्याह हो रहा हूँ फख्र है ,उफ़ अब भी ना निकाली जायेगी बेइन्तेहाँ रुस्वाई कमाई है मैंने उम्र भर इश्क पे अब कत्तई नज़र ना डाली जायेगी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें