कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0017

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तन्हाई

तन्हाई...... लगा न था यूँ दूर निकल जायेंगे क़दमों के निशान खुद बखुद पुछते चले जायेंगे रिश्ते हों या यादें दस्तक दें भी तो कैसे ? खुद भटक रहा हूँ एक बैरंग लिफाफा जैसे लगा न था यूँ दूर निकल जायेंगे जीतते रहे इश्क में मौत से हार जायेंगे अब भी लुटने की ख्वाइश दबाये कब्र में लेटे हैं ऐसे में क्या मांग लेंगे वो हमसे?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें