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रचना 0014

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इक बूंद इक बूंद नज़र मिली

इक बूंद इक बूंद नज़र मिली, मैं खूबसूरत हो गयी इक बूंद वफा मिली, मैं तेरी ओर खिंच गयी इक बूंद अल्फ़ाज़ मिले, मैं तेरी कायल हो गयी इक बूंद इकरार मिला, मैं बांवरी रूमानी हो गयी इक बूंद एहसास मिला, मैं जीती जागती दीवानी हो गयी इक बूंद मुस्कान मिली , मैं खुशियों की आदी हो गयी इक बूंद स्पर्श मिला, मैं जन्नत सी रूहानी हो गयी इक बूंद तड़प मिली, मैं मोम से पानी हो गयी इक बूंद दुआ मिली, मैं खुशकिस्मती की निशानी हो गयी इक बूंद शरारत मिली, मैं भी न जाने क्या-क्या कह गयी इक बूंद पनाह मिली, मैं वक़्त थामे वहीं बस गयी इक बूंद आगोश मिला, मैं घुलते घुलते तुझमे समां गयी इक बूंद धड़कन मिली, मैं बस वहीं बुत बन गयी इक बूंद इश्क़ मिला, मैं क्या से क्या हो गयी इक बूंद तू मिला, मैं कहाँ रही ?न जाने कब की तुझ पर फ़ना हो गयी बूंद -बूंद से सजा ये रिश्ता हर बूंद से पनपा ये रिश्ता बस एक बूंद में सिमटा ये रिश्ता पर बूंद का नहीं सागर सी गहराइयों का वजूद लिए ये तेरा-मेरा रिश्ता
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें