कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 4549

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लिख लेने से दुनिया बड़ी नहीं हो जाती

लिख लेने से दुनिया बड़ी नहीं हो जाती सिमट जाती है । तेरे होठों पर तेरी आंखों में । भर जाती है तेरी उंगलियों में जब छू कर पढ़ते हो मेरा लिखा और मुस्कुरा कर रद्द कर देते हो मेरा होना। बाहर की ओर जाते हुए हम अपना भीतर कभी नहीं छोड़ते। यह बस प्रेम कर सकता है या प्रेमी पहाड़ों के पास केवल देवस्थल हैं l आस्था है । पहाडन के पास तुम हो । आस है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें