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रचना 4522

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प्रेम खुद किस्मत के दरवाजे से रोज़ उदास लौटता है .... और…

प्रेम खुद किस्मत के दरवाजे से रोज़ उदास लौटता है .... और प्रेमी हैं कि उससे सदके ,दुहाई ,इल्म की आस करते हैं। आप भी क्या बात करते हैं ? मैं भी क्या ही बात करती हूं। इन लौटती सीढ़ियों पर बैठे हुए उसने उस रोज़ कुछ भी नहीं कहा। पर मैंने सुना... उदासी कुछ नहीं होती पर... उसका स्वाद होता। गंध होती है । देख होती है । ध्वनि होती है । छुअन होती है। प्रेम का क्या है ... वो तो वैसे भी कहीं नहीं रहता। कहीं का नहीं रहता। * अद्भुत तस्वीर Krishna Kalpit ji की वाल से संजोई है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें