भाषा / Language
प्रेम से निकल कर जाते हुए मैंने तुम्हें खुद में रोक कर कहा.…
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प्रेम से निकल कर जाते हुए मैंने तुम्हें खुद में रोक कर कहा.... तुम से प्रेम करने के लिए मुझे अब तुम्हारी भी जरूरत नहीं। तुम इतने दिनों से मुझमें रुके रहे बस इसी बात का शुक्रिया रख सकते हो। मुझे प्रेमिल बनाए रखने का आभार ।तुम उड़ सकते हो मुझसे।
इतने अतिरिक्त तुमको मिटाते हुए मैं अब और प्रेमिल हुई हूं।
और ये कहते हुए अधिक सुंदर हो जाती हूं कि....
पहले ढूंढती फिरती थी तुमको ....
*तुम हो* ?
अब तसल्ली है कि *तुम ही हो*।
मेरा ही पृष्ट फाड़कर मुझमें नया अध्याय शुरू किया जा चुका।
थोड़ा तुमने थोड़ा मैंने भी किया ।
अब प्रेम में मैं ही हाशिया हूं...
और हस्ताक्षर भी।
तुम भी हो भीतर कहीं।
वहीं...
जहां चूमने ,देखने, मिलने ,छूने ,बोलने की मनाही नहीं होती।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें