भाषा / Language
बड़ी देर से
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बड़ी देर से .....
लफ़्ज़ों में ......धागा पिरो रही हूँ
कि कुछ लिख सकूँ ....
औराक़ पर तुम्हें दिख सकूँ ......
पर ...
आज न लफ्ज़ संभल रहे..... न डोर ....
इस लिए ....
पाती पर मुस्कान बिखेर दी है
आज मेरे संग.....कुछ पल .....मुस्कुरा लो ना
इन लफ़्ज़ों को ......चिढ़ा दो ना
बस यूँ ही ......मेरे लिए
मेरी हैरत के क़ाबिल बस वो एक ही है....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें