कल्पनाशब्दों के बीच
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मेरे भीतर का प्रेम मौन सही.... सिर्फ़ तुम्हारा है ।

मेरे भीतर का प्रेम मौन सही.... सिर्फ़ तुम्हारा है । *तुमने कहा मेरे पास दूरियाँ हैं। मैंने सुना...ज्यादा पास आना असल में है दूर जाना। *तुमने कहा तुम्हें अपने कदमों पर वश नहीं। मैंने सुना....मत कहो। मुझे आवाज़ से उलझन होती है। *तुमने कहा आसमान चाँद सूरज उगाने के लिए है। प्रेम का मचान न लगाओ। मैंने सुना....मेरे लिए होंठ मत जलाया करो...तुम्हारा मुझे बनाना ही बिगाड़ देना है। *तुमने कहा....कायम रहो। दूर....बहुत दूर मैंने सुना.... उदासी सबसे खूबसूरत फूल है। तुम पर अच्छा लगता है। *मैंने कहा.....अच्छे तो हो न? तुम ने सुना पर शायद मुझे अनसुना रखा रहने दिया।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें