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कई दफा जब तुम मुझमें नहीं हो रहे होते हो तो मैं खुद को पोंछ…

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कई दफा जब तुम मुझमें नहीं हो रहे होते हो तो मैं खुद को पोंछ रही होती हूं। रंग उड़ी हुई हिना को देखती हूं तो सोचती हूं ये तुम थे या मैं थी खुद में मैं भूलना नहीं जानती हां....याद आना जानती हूं। आते रहना। मैं तो आ ही रही।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें