कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 4415

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मुझे अब तुम ज़रा सा भी नहीं चाहिए।

मुझे अब तुम ज़रा सा भी नहीं चाहिए। ये कहने के लिए मैंने खुद में एक समंदर सोख लिया है। मेरी हंसी में तुम सुराख कर नहीं पाओगे। उसके लिए तुम्हें मुझसे प्रेम सीखना होगा।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें