भाषा / Language
अक्सर हम सुंदर जानकर असुंदर को
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अक्सर हम सुंदर जानकर असुंदर को ,
प्रेम जानकर अप्रेम को, सहज जानकर असहज को छू आते हैं।
मांगते कुछ है....और क्या पा जाते हैं।
पर ईश्वर हमारा मोल जानता है।
कम में नहीं मिटने देता सच्चा दिल।
*****तुम चाहिए कहा था एक रोज़...
अब भी वही कहना है।*****
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें