कल्पनाशब्दों के बीच
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जाने क्यों

जाने क्यों ...? मुझे हमेशा से दरवाजों से कम खिड़कियों से ज्यादा प्रेम रहा है। दरवाज़े आज़ाद नहीं करते.... खिड़कियां शायद मुक्त कर देती हैं। मैं प्रेम को स्थगित करना कभी नहीं सीखूंगी... खासकर अपने आप से। रोज़ नई खिड़कियां .... अक्षर वाली ही सही गोद लूंगी खुद पर ..... दरवाजे खुले न खुले ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें