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अक्सर मैं नहीं चलती पर अपने मन में चलती रहती हूँ। मुझे अपना…
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अक्सर मैं नहीं चलती पर अपने मन में चलती रहती हूँ। मुझे अपना मन उठाकर तुम्हारी ओर आना बेहद पसंद है।
चलते रहने और ना पहुंचने का अपना सुख है.....वो ओर खत्म नहीं होता।दिखता रहता है।
कहीं न जाकर भी जाने ,रुकने ,जीने फिर लौटने का सुख सबके हिस्से नहीं आता। ये एक कला है जिसमें निराशा की कोई गुंजाइश नहीं। न पाने खोने की।
एक चेहरा ही दिशा हो जैसे।
बिना मिले मन कहा है कभी? खाली हुए हो कभी? छू कर लर्जिश आई है कभी? हवा को आँख बंद कर चूमा है कभी। इस मासूमियत पर हंसे हो कभी?
अगर हाँ... तो बिना चले मन उठाना जानते हो तुम । मैं तो दिन भर में कई कोस चलती और जीती जाती हूँ।
ये एकांत का अपना सुख है l कोई हमसफर कोई ...रहबर नहीं .. बस हमनवाई हो ।
जो मन उठाकर मन में चलना सीख सके वो अकेले मुस्कुरा सकता है प्रेम में।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें