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रचना 4339

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हम ही कीड़े.... हम ही रेशम

हम ही कीड़े.... हम ही रेशम हमारे अंदर का रेशम ही तब पनपता है जब हम अपने अंदर की हरियल काई खा जाते हैं। हम सफ़ेद रेशमी कीड़े हैं। लुर बुर - लुर बुर अपने दुःख ,अवसाद और उदासी की मलबरी को खुद खाते हैं । पसरे रहते हैं। नम मन ठोस कुकून में बदलता है और वक्त से लिपट कर हम बिन गांठ के कोमल रेशे से दिखने लगते हैं... मुस्कुराते रंग भरे मखमली दो पैरों का रेशमी कीड़ा मरने से पहले कई बार मरता है ....कई बार रेशम जनता है। इसके उगते *पर* फिर फिर टूटते बनते रहते हैं पर पैर चलते रहते हैं। वो रुकते नहीं। रेशमी कीड़े दो पैर पर खड़े हो अपना रेशम खुद बेचते हैं। जिस दिन थक जाते हैं बिना *पर * उड़ जाते हैं... हम ही कीड़े.... हम ही रेशम हमारे नाम वाला रेशम धरा रह जाता है ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें