कल्पनाशब्दों के बीच
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अब जब तुम ही नहीं सुनोगे तो मैं कहां जाऊंगी

अब जब तुम ही नहीं सुनोगे तो मैं कहां जाऊंगी... एक तुमको एक उसको ही तो पता है मेरे पास और कोई पता नहीं है। *बहुत देर तक ..... उँगलियों के बीच ..... कलम नचाते रहे कुछ .....सोच सोच मुस्कुराते रहे रोते रहे पर ..... कुछ लम्हे ..... लफ़्ज़ों में ना बंधे ...... तो बस..... ना ही बंधे ! इतना काफी है ..... या .....और लिखूं ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें