कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 4310

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जो आपसे कुछ भी न चाहता हो उसे *हल्का* कुछ भी देने से पहले…

जो आपसे कुछ भी न चाहता हो उसे *हल्का* कुछ भी देने से पहले दो बार सोचना चाहिए था.... सब खेलने को आतुर नहीं रहते शतरंज। कौन देता है तुम्हें हक दुखाने का...
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें