कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 4308

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तुमको नकारना मेरे बस की बात नहीं।

तुमको नकारना मेरे बस की बात नहीं। सुनो! तुम मुझे अपने में रद्द कर दो थामे रहो ! लौटना निहित हो नहीं सकता मेरा कि मैंने अपना उद्गम, संगम और विलय तुम्हारे नाम लिख दिया है अब मेरा कोई नाम ....कोई पता नहीं मैं किधर जाऊंगी? मैं क्यूँ जाऊंगी? *तस्वीर अभी कुछ देर पहले मां के दरबार से लौट कर ली है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें