कल्पनाशब्दों के बीच
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पानी सा रखना मुझे

पानी सा रखना मुझे..... बचा कर सबसे छिपा कर एक रोज़ मैंने उसे खुद को सौंपते हुए कहा। छिपा ही रखा है ... तुम होकर भी होती कहां हो कल्पना ? उसने ये कह कर मेरा होना ही नकार दिया। मेरी सौंप बिखर गई। बाद बरसों तक रखा रखा पानी एक रात इत्र हो गया। मैं मिल गई और वो खो गया।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें