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सब पहाड़ नहीं होते

सब पहाड़ नहीं होते.... बरसों से आंख बंद कर जब भी बैठी लगा हम आपस में मिलने वाले हैं। किसी से मिलने की इतनी आतुरता.... इतनी व्याकुलता पहले कभी नहीं हुई। जाने क्या सुख पाऊंगी ? जाने क्या विकलता खत्म होगी? मिलने के बारे में अक्सर सुना था ... कि यह सुख लाता है। सारी बेचैनियों को शांत कर देता है। एक आग पानी पा जाती है। बहुत सारी दूरी पाट दी जाती है। बहुत सारी नजदीकियां नाप दी जाती हैं। खामोशियां ध्वनियां और आस आगोश हो जाते हैं। दिल दो दो बार एक बार में धड़कता है आंखें एक बार में सौ बार मिलती हैं। देह हरारत पाती है और हथेलियां चैन । मिलना हंसी और आंसुओं की अदला बदली लाता है। होश और नादानियों की फेहरिस्त लंबी हो जाती है। उदासी और विरानियों की फसल कट जाती है। हम मिलकर *काफ़ी* हो जाते हैं। बेशुमार लुत्फ की शाम है मिलना। एक लंबी नज़्म ... एक हैरान करने वाली कहानी एक चुप्पी का अंत। मिलना हमें ईश्वर की तरफ ले जाता है थोड़ा सा और। पर.. ऐसा मिलना तभी होता है जब दो प्यारे लोग एक जैसी vibrations में हो। एक high vibration में और एक low vibration में हो तो मिलना नहीं झेलना होता है। आप चाह कर भी किसी दूसरे को lower vibrations से हाथ देकर अपनी तरफ खींच नहीं सकते। Soul purpose पूरा हुआ नहीं ...अभी Divine time दूर है। मेरे हिस्से में मिलना न आया ... लोग आए। बहुत सारे लोग। *मिलना..... कभी पहाड़ से पहाड़ जैसे लोगों से। मिलने सा सुख नहीं .....मिलने का सुख देंगे। आना कभी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें