कल्पनाशब्दों के बीच
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ये दरारें

ये दरारें .... कभी हममें भर गईं कभी हम उनमें भर गए। चाक जिगर न दिखा न देखा गया हम सन्नाटे से भर गए। मोम पिघलता रहा। *रोज़ ताज़ा सितम ईजाद किया फिर भुलाया... फिर याद किया
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें