कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 4289

भाषा / Language

मन की रावी कभी कभी सूखती है।

मन की रावी कभी कभी सूखती है। तुम्हारे नाम के मनके गिर गए हैं कहीं मुझसे। या फिर मैं ही गेर आई हूं कहीं। शुक्रिया फिर भी कहूंगी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें