कल्पनाशब्दों के बीच
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हम तुम चलता फिरता कब्रिस्तान हैं

हम तुम चलता फिरता कब्रिस्तान हैं.... एक ज़िंदा मज़ार दुःख दबाते जाते हैं... फूल उगाते जाते हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें