कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 4281

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रात ने मेरे लिए अपने उजाले कितने कम कर दिए हैं।

रात ने मेरे लिए अपने उजाले कितने कम कर दिए हैं। मैं चाँद थोड़े ही हूँ। रात की विनम्रता भर हूँ। *अँधेरे को काला कह देने के लिए शब्द नहीं ...सोच चाहिए
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें