भाषा / Language
प्याला भर लोग
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प्याला भर लोग...
अनजाने ही सही हम अपना इत्र एक ऐसे इंसान पर छिड़कते जाते हैं जिसे पानी का मोल पता होता है। वो आसानी से उपलब्ध चीजों का आदी हो चुका होता है।
वो भेद करना भूल जाता है या फिर जान बूझ कर अपनी सहूलियत के लिए इत्र को भी पानी सरीखा तवज्जो देता है।
इसके उलट हम अपने प्याले खाली करने के मारे लोग हैं। तुम तक आए ही इस लिए कि अपने प्याले का ज़मज़म तुमको दे सकें। रत्ती भर स्वार्थ है इसमें ... बस यही की तुम को एक रोज़ चुना और फिर गालिब हो गए। कोई भाता ही नहीं अब। एक रोज़ एक दुःख पीठ पर धर लिया। इसी को प्रेम कहा।
ये बात कितनी दिल भर देने वाली है कि ठीक प्याले खाली करने के समय आभास हुआ कि जिसको अपना दुःख चुना... वो दुखी करने की सारी जादूगरी से वाकिफ है। उसने मना रखा है कि इत्र को पानी कहकर थूका जा सकता । खारिज़ किया जा सकता है।
मैं अक्सर सोचा करती हूं... कहती भी हूं...
प्याले अगर भरवाने का मन रखते हो तो पहले खाली होना जानो। सीखो ये शउर कि भरा प्याला देने वाला प्रेमिल मन है। अपने इत्र का रखाव जानता है। लौट जाएगा पर पानी की तरह बहाया जाए इस बात पर कत्तई राज़ी न होगा। अपना प्याला खुद में वापस उड़ेल लेगा।
स्व प्रेम से भर जाएगा।शुक्रिया भी कहेगा।
अंतर समझो
खुद में पलट गए लोग
वापस नहीं लौटाते अपना इत्र।
ज़मज़म सबका मिल जाए ऐसा भी क्या है तुम में। एक ढंग का मन भी तो दिखा नहीं तुम में।
सोचना ... क्या खो दिया
क्या दे ना पाए।
तुम प्याले में पानी के ही हकदार हो
रखो।
*ये गीत सुनते हुए लिखा गया। आवाज़ दो हमको ....हम खो गए।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें