कल्पनाशब्दों के बीच
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ज़ख्म हो या खाई भरने को समय लगता है।

ज़ख्म हो या खाई भरने को समय लगता है। ये बात भी मेरे मन की है कि कोई मेरे मन का पता क्यूं पाए। कोई क्यूं जाने कि मन की कौन सी धमनी फूटी है और कौनसी नस दब गई है मेरी। जिसका हक ही नहीं उस और पर ....मेरे घाव का रक्तिम रस क्यूं गिरे? कोई क्यूं नापे मेरे मन की लंबाई, चौड़ाई और गहराई? ये सारे उपहार तुम्हारे हैं ।तुमको ही मिलेंगे।खाई में जगह बस दो लोगों की है ।तीसरा घुट जायेगा।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें