कल्पनाशब्दों के बीच
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कुछ पाती नहीं उससे

कुछ पाती नहीं उससे... फिर भी उसे उसीमें से अपने लिए थोड़ा सा रखने का मन रखती हूं | ये आँखें तुमको सुन नहीं पा रहीं.... कहाँ हो तुम? *कभी तो आवाज़ देंगी खामोशियाँ.... तब तक शून्य प्रेम सींचती रहूँगी। बेवजह नहीं मिलना तेरा मेरा😊😊😊 *ख्वाबों की फरवरी बारहमासी है ... आते रहना।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें