कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 4171

भाषा / Language

मन का द्वंद जब सांखल नहीं झरोखा खोले

मन का द्वंद जब सांखल नहीं झरोखा खोले .... तो समझो प्रीत हुई। *जो प्यासा हो फिर भी आँखें तकता हो.... बस वही हो तुम मेरे
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें