कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 4100

भाषा / Language

समझने के लिए दुनिया बहुत है

समझने के लिए दुनिया बहुत है..... तुम होने के लिए आसान हो जाओ। *रात ख़्वाब में रेत और पहाड़ का मिलना हुआ। मुझसे नदी नौले निकलते हैं फिर भी आस में खड़े रहता हूँ ...पहाड़ अनमना होकर बोला तो मुझसे तो कुछ भी नहीं निकलता इसी लिए तो प्यास में लेटी रहती हूँ...रेत ने इठलाते हुए कहा फिर दोनों बहुत देर तक एक दूसरे की हथेलियों को सहलाते रहे। पहाड़ ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा....क्या किया जा सकता है? रेत ने कहा ...सुनो! थोड़ा झुक जाओ मैं तुममें प्यास के कंकड़ डालती हूँ और तुम मुझे आस से भर दो। कुछ न कुछ तो होगा.... जरूर। शायद हम दोनों भीग जाएं। पहाड़ थोड़ा झुका तो रेत उस से झट लिपट गयी। दो अलग अलग शहरों में इस समय अभी बारिश हो रही है। होने को क्या नहीं हो सकता। जो न हो उसे सोचा करो.... कि तुम कल्पना के चुंगल में हो... कोई भी जादुई हो सकता है कुछ भी जादू हो सकता है। हो ही रहा है..... 😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें