भाषा / Language
खंजर से ही निकलती है धार
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खंजर से ही निकलती है धार
उम्मीद से तो लहू निकलता है।
इस दफ़े सलीके से प्रेम में पड़ूँगी
इसी पुराने प्रेम के दर पर रखूंगी जिद्दी उदास अर्जी ।
* अब रोज़ मलंग शामें ढलती हैं
पर मैं डूबती कभी कभी हूं
जैसे आज.... अभी
शुभ रात
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें