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रचना 4008

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खंजर से ही निकलती है धार

खंजर से ही निकलती है धार उम्मीद से तो लहू निकलता है। इस दफ़े सलीके से प्रेम में पड़ूँगी इसी पुराने प्रेम के दर पर रखूंगी जिद्दी उदास अर्जी । * अब रोज़ मलंग शामें ढलती हैं पर मैं डूबती कभी कभी हूं जैसे आज.... अभी शुभ रात
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें