कल्पनाशब्दों के बीच
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ये बहुत सादा सी बात है कि आप किसी को खुद में पसरने का मौका…

ये बहुत सादा सी बात है कि आप किसी को खुद में पसरने का मौका देते हो तो सबसे पहले वो अपना मुखौटा उतारता है । ठीक उसी समय परखने का वक्त शुरू होता है। मुखौटा उतरते ही मन के छाले फूटने लगते हैं । और छाले भी उसीके फूटते हैं जो निश्चल होता है।बरसों से साथ चलता है। रो देता है। जो विवश हो जाता है। जो जाते वक्त नाम और निशान दोनों मिटा जाता है। शातिर निभा ले जाते हैं दर्द और हंसते रहते हैं। वहीं छूट जाते हैं ....उनका मुखौटा और खंजर। पर ये आबले निशान छोड़ जाते हैं। जो तुम्हें हंसी दे जरूरी नहीं संग रो भी सकेगा। पर ये तय है जो रो सके तुम्हारे लिए वो एक बूंद स्नेह से यकीनन मुस्कुरा देगा। कभी सोचती हूं....कोई क्या लेने जाता होगा किसी के पास। किसके पास इतना है ... कि दूसरों को दे सके? सब के हाथ खुले ही दिखते हैं ..... मेरे भी तुम्हारे भी तो क्या है जो बांटना है ? शायद मुठ्ठी भर दुःख मेरा और सेर भर दुःख तुम्हारा *मैं अच्छी हूं * *तुम भी अच्छे हो।* पर आज कल दुनिया *बहुत अच्छे* लोगों की है। उन्हीं से चलती है। इस बात में जादू है... समझने लायक याद रखने लायक सीखने लायक ****आखरी छुट्टी है आज... मन अकेले बैठा गोता खा रहा। जो कहता गया... मैं लिखती गई। एकांत परम सुख है।कहने सुनने के लिए परफेक्ट तस्वीर भी बस इसी पल की है। मेरे ख्यालों में हम टाइप्स
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें