भाषा / Language
कविता मुझमें पसरी सीलन है।
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कविता मुझमें पसरी सीलन है।
लिख कर सूख जाती हूँ।😊😊😊
मैं कल्पना हूँ और तुम मेरी..... परिकल्पना
इस उपकल्पना को सिर्फ़ मैं ही मूर्त कर सकती हूँ।
तुम मेरे समानांतर चल तो सकते हो पर रह नहीं सकते।
मैं एक पायदान खुद उतर के नीचे आना चाहूँगी।
तुम्हें मैंने चुना है।
अपने लिए।
*तस्वीर आज सुबह की है ।
मुझे जल्दी उठने की खब्त है। चार बजे के बाद सो नहीं सकती। ढेर सारा वक्त *अपने होने *का यही है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें