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सराहना सुकून देती है...वो भी तब जब लिखना बस दर्ज़ करना होता…

सराहना सुकून देती है...वो भी तब जब लिखना बस दर्ज़ करना होता है।कोई जिजीविषा नहीं लेखनी में। लिखती हूं तो लगता है मन मथ लिया। सबसे सांझा करती हूं तो लगता है मथनी अलग कर के रख दी है और मन यथा स्थिति पर रख दिया है। मेरे लिखे का कोई सिर पैर नहीं होता ।पर जब Ajamil Vyas sir उस लिखे से मन निकाल कर पोस्टर बना देते हैं तो लगता है ...लिखना चाहिए। धड़क बनी रहती है। लहू बहता रहता है। मन गूंगा नहीं रहता। बहुत शुक्रिया आपका sir... स्नेह संजो रही।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें