भाषा / Language
दूर जाकर ही सुन सकोगे मुझे
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*दूर जाकर ही सुन सकोगे मुझे
मैं एकांत में खिल जाने वाली पुकार हूँ
उसके मौन और मेरी उदासी के बीच एक लंबी दूरी है
बीच में कोई योजक चिन्ह नहीं।
संयोजक बस अदृश्य प्रेम है।
*प्रेम में तुमको एक दिन वो दूँगी जो कभी सोचा न था कि तुमको दे सकूँगी।
तुमने वही बोया है मुझमें
पक कर वही तो गिरेगा
तुम्हारी झोली में....
मेरा मौन सदा के लिए तुम्हारा
*मैं दरख़्त ही एक पत्ती वाला बची हूँ
मौन की वही पत्ती तुम्हारे लिए रुकी है।
एक रोज़ गिरेगी...
उसे बिना छुए रख लेना
मन के पांचवे खाने में
मैं तर जाऊँगी।
*प्रेम पर समाप्ति तिथि नहीं लिखी मैंने....
जिस रोज़ तुम *क्यूँ* कहोगे...
उस रोज को मैं *क्यूँ नहीं *कह कर फिर सृजन करूँगी।
मैं अपने प्रेम को ज़ाया कैसे कर दूँ? मौन सुखा कर पंखुड़ी की है। मैं रचूंगी अपना सुंदर फूल ... अपनी देह के लिए।
***हम हाँ कहने में हिचकते हैं और ना कहने में मर जाते हैं***
लिख कर एक दो फालतू साँस आ जाती है बस ...
मुझे।
दिन शुभ रहे।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें