कल्पनाशब्दों के बीच
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मिल लेते

मिल लेते .... कुछ कहना थोड़े ही था ..... बस कुछ देर आँखें बदलनी थी .... इंतज़ार थक रहा था। प्रेम जैसी उधेड़ मुझे *तुम* जैसा रफूगर ही दे सकता है... इस लिए आवाज़ देती हूं। ये कत्तई मत समझना कि छोर इधर का ही खुला है ।जानती हूं मैं बाहें उधर भी खुली हैं ।हथेलियां दुआ में वहां भी मिली हैं । तुमको ईश्वर इधर की राह देंगे एक रोज़ वर्ना लड़ न लूंगी उनसे।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें