कल्पनाशब्दों के बीच
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टूटन किसी की भी दी हुई हो....अपना हिस्सा खुद समेटना पड़ता है ।

*टूटन किसी की भी दी हुई हो....अपना हिस्सा खुद समेटना पड़ता है । अपनी शिफ़ा की बरक़त सिर्फ़ अपने पास होती है। *बेहतर को बेहतरीन ही मिलना चाहिए था.... जैसे तुमसे मिलकर मैं खुद को मिली। *यकीन मानिए ... नज़रंदाज़ ही सबसे ट्रेंडिंग अंदाज़ है... try it. *दिन में थोड़ा और दिन रात में थोड़ी और रात मिला सकती हूँ.... तुम्हें याद करते करते *कहाँ पहुँचूंगी कभी नहीं सोचा.... कहाँ से चली थी बस ये याद रखा तुम्हारे मिलने.... न मिलने से रास्ता भी बनता मिटता रहा। सफ़र में रहूँगी.... *मेरी भीड़ एक चेहरा है और वही मेरा शहर भी.... उसका रूठ जाना मुझे बंजर कर देता है। *मैं बबूल के प्रेम में पड़ गयी हूँ.... पड़ी रहूँगी... कम ज्यादा क्या होता है? *आधा प्रेम धरा है ..आधा बाकी है। मैं लिख चुकी "तुम्हारी"....अभी "तुम्हारा"बाकी है। *मन का किवाड़ सब के लिए खुलता है पर खिड़कियों पर सिर्फ़ तुम्हारा हक़ है। मुझे किवाड़ बंद पसंद है और खिड़कियां खुली। *तस्वीर में उसकी रुकी हुई नज़र भी इतनी वाचाल है कि मैं मूक रह जाती हूँ। 💐💐💐मन चलता रहता है तो उंगलियाँ भी चलती रहती हैं। लिखना नहीं आता। कहना आता है... कह देती हूँ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें