कल्पनाशब्दों के बीच
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बेशक हम बादलों पर रहते हैं

बेशक हम बादलों पर रहते हैं मसला ये है कि हर बारिश को तरसते हैं शहर सांझ .......
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें