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प्रेम वो संगतराश है जो हाथ लगाकर पत्थर को ही मूर्त नहीं करता
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*प्रेम वो संगतराश है जो हाथ लगाकर पत्थर को ही मूर्त नहीं करता ....
कभी कभी बिना हाथ लगाए मूर्त को भी पत्थर कर देता है।
बस उसके मन के अ मन हो जाने की बात है।
ठीक जैसे मेरे संगतराश ...तुम।
* मेरे रंगीन चिनार हो तुम ...
पतझड़ ही लाओगे
जानती थी मैं...
सुर्ख दुःख मेरी नियति हैं।
अब इसे मेरा श्रृंगार समझो
तुमसे
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें