कल्पनाशब्दों के बीच
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दिल से निकलते ही कुछ दूर

दिल से निकलते ही कुछ दूर .... कुछ देर तक चलते ही लगता है.... यहीं तो बैठी थी रात भर पिछले सारे पहर मेरी किसी नज़र से निकलते ही नहीं तुम ...कि कहीं और कुछ देख सकूं... देख सकूं कि तुम्हारे सिवा और क्या है इस वीरान बंजारे शहर में देखने लायक। हर ढलने में एक ही चेहरा कैसे उगता डूबता है। एक ही कशिश कई साल बूढ़ी होने पर भी मन के पानी में नीली आंखों वाली जल कन्या कैसे लग सकती है ? कैसे कहा जाय प्रेम कि बस तभी नीला जादू हो जाए l तुम दिखते तो रहे हो मुस्कुराते हुए। आते हुए कब दिखोगे? ये आसमानी नीला सा रंग क्या है.. बताना। बहत्तर बार को सौ बार धड़कना तो कह सकती हूं पर हर धड़क पहली दफे सी लागे...ये तिलिस्म तुम्हारा है। कारीगरी मेरी कह सकते हो। कुछ कहने और नहीं कह पाने के बीच जो सांसे ठहर जाती हैं वो गली तुम्हारी है ..वो नाम तुम्हारा है। घर का सा सुकून और आवारा यायावर एक ही शक्ल के कैसे हो सकते हैं? साए एक होते होंगे शायद। पास जाते ही सब भूल जाने वाले मन टिक कर कहां वहां रहते हैं ।कभी तुम वहां रहते ही नहीं ... कभी मैं जा चुकी होती हूं । बस एक ढूंढ महकती रहती है । दो आंखों दो अधरोंं के बीच की दूरी मापी नहीं जा सकती ... ठीक जैसे मैं इस अनजाने शहर की भोर को अंजुरी में भर कर तुम्हारे गालों में मलना चाहती हूं। कल रात हुई बारिश से भीगे इस हरे दरख़्त से तुम्हारा नाम सांझा करना चाहती हूं। हथेलियां रंग ली है। नाम ले लिया है। तुम कहां हो? *बिना चले कुछ डोंगियां पहुंच जाती है प्रेम सौ तरीके ऐसे जानता है। लिखना....उसमें से एक रत्ती भर है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें