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रचना 3708

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तुम को सबसे सरल रखती हूँ.....अपने नाम में छिपा कर

तुम को सबसे सरल रखती हूँ.....अपने नाम में छिपा कर मेरी कविता हमारा मिलने का समय है। कितना सारा हो तुम 💐💐💐💐 उस दरार से धूप आए ना आए.... तुम आ जाया करो ज़िन्दगी बनी रहती है ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें