भाषा / Language
( दोहे )......😊😊😊😊
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( दोहे )......😊😊😊😊
चंदा ढूंढे चाँदनी , सूरज खोजे भोर
पिया बसे परदेस हैं , अंधियारा चहुँ ओर
अपने पी की क्या कहूँ ,वो कैसे चित चोर
प्रेम पाश में बाँध के ,खींचे अपनी ओर
बुरी प्रेम की प्रीत है,पल पल है तड़पाय
आस मिलन तो रह गयी , गया प्रेम कुम्हलाय
धीरे धीरे अब भला ,कछु ना होता काज
सब्र पुराना हो गया , वक़्त नया सरताज
माली मेरा बावरा ,कोशिश करता जाय फलदायी या ठूंठ हूँ ,पानी देता जाय
हौले हौले रे मना तू भी तो कुछ बोल
ऐसा मौका ना मिले राज़ दिलों के खोल
प्रयास भर है । पुराना लिखा है।
तस्वीर अभी की है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें