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बाज़ार जाकर क्या खरीदोगी

बाज़ार जाकर क्या खरीदोगी .... वक्त ने उम्र से पूछा थोड़ी सी फुरसत और थोड़ी सी मैं दोनों खत्म हैं....उम्र ने हंसते हुए कहा मुझसे मुझ ही को मांग रही हो... तंज है क्या? वक्त ने पूछा। तंज ही समझो... तुम और प्रेम रुकते कहां हो? बस होते हो। तुमको फुरसत देनी है और बची हुई मैं को प्रेम बाज़ार बंद होने को है ....कहकर उम्र जल्दी जल्दी सीढियां चढ़कर आगे बढ़ गई। अरे सुनो... मैं आ तो रहा ....रुको तो रुको तो....वक्त पुकारता रह गया। उम्र रुकी नहीं.....फिर दिखी नहीं। वक्त सबसे निचली पायदान पर ढेर हो गया।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें